इस रहस्यमयी ग्रंथ में छिपा है कल्याण का मार्ग

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Friday, March 14, 2014-7:58 AM

हिन्दू आस्था, जिन प्रमुख शब्द शिलाओं पर टिकी हुई है, उनमें  श्रीमद् भगवद् गीता का प्रमुख स्थान है। वास्तव में श्रीमद् भगवद् गीता का महात्म्य वाणी या लेखनी द्वारा वर्णन किया जाना संभव नहीं है क्योंकि यह एक परम रहस्यमयी ग्रंथ है। इसमें सम्पूर्ण वेदों का सार संग्रह किया गया है।

इसकी भाषा इतनी सुंदर और सरल है कि थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है परंतु इसका भाव एवं आशय इतना गहरा है कि आजीवन इसका पारायण करते रहने पर भी इसके मर्म तक जिज्ञासु नहीं पहुंच पाता।
विश्व का ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसकी चर्चा गीता में न की गई हो। ग्लोबल वार्मिंग, ध्यान, योग, परिवार-संचालन, संस्कार, सदाचरण, कर्मयोग, संस्कृति, विवेक, कर्मकांड, राजनीति, प्रबंधन, वाणिज्य, अर्थशास्त्र, भौतिकी, भूगोल, पर्यावरण, काम, मोक्ष, अहंकार, मोह, ममता, जन-मन, तनाव-मुक्ति, संवाद-कला जैसे अनेकानेक समसामयिक विषय जो वर्तमान में प्रचलित हैं एवं वे विषय जो अभी हमारे कल्पना लोक में ही विचरण कर रहे हैं उन सब पर हमारा मार्गदर्शन गीता में किया गया है।

गीता के विषय में यह जन विश्वास है कि महाभारत के युद्ध के समय जब कौरव एवं पांडव एक-दूसरे को परास्त करने के लिए रणभूमि में खड़े हुए थे, तब कृष्ण-सखा अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को विपक्षी-सेना में देखकर मोहग्रस्त हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने, जो उस युद्ध में पांडवों के सहयोगी की भूमिका में थे और अर्जुन के सारथी बने हुए थे, परम प्रिय अर्जुन के मोह-नाश के निमित्त जो कुछ उपदेश किए वे ही गीता में संकलित हैं।

इसके अनुशीलन से प्रतिदिन नए-नए भाव उत्पन्न होते रहते हैं जिससे यह ग्रंथ सदैव नया बना रहता है। भगवान के गुण, प्रभाव तथा मर्म का वर्णन जिस प्रकार इस शास्त्र में किया गया, वैसा अन्य ग्रंथों में नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद् गीता  के रूप में ऐसा अनुपम शास्त्र विश्व को दिया है जिसमें एक अक्षर भी सदुपदेश से खाली नहीं है।

श्री वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता जी का वर्णन करने के उपरांत कहा है

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शासविस्तरै:।
या स्वयं पद्यनाभ्स्य मुखपद्याद्विनि:सृता।।

गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात श्री गीता जी को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अंत:करण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है, जोकि स्वयं पद्यनाभ भगवान श्री विष्णु के मुखारविंद से निकली हुई है, स्वयं श्री कृष्ण भगवान ने इसके महात्म्य का वर्णन किया है।

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैश्यत्यसंशय:।।


अर्थात जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्यमुक्त गीता शास्त्र को मेरे भक्तों से कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा-इसमें कोई संदेह नहीं है।

गीता के महत्व के विषय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं अन्यत्र कहते हैं कि जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि  से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोक को प्राप्त होगा :

 श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर:।
सोडपि मुक्त: शुभाल्लोकान्प्रात्रुयात्पुण्सकर्मणाम्।।

गीताशास्त्र के पठन-पाठन का मनुष्य मात्र को अधिकार है, चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रम में स्थित हो, परंतु भगवान में श्रद्धा और भक्ति अवश्य होनी चाहिए क्योंकि भगवान ने अपने भक्तों में ही इसका प्रचार करने के लिए आज्ञा दी है तथा यह भी कहा है कि पापयोनि भी परमगति को प्राप्त होते हैं :

मां  हि पार्थ व्यपाश्रित्य येडपि स्यु:पापयोनय:।
स्त्रियों वैश्यास्तथा शुद्रास्तेडपि यान्ति परां गतिम्।।


अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा मेरी पूजा करके मनुुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं -

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदंततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यच्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।


इन सब पर विचार करने से यही ज्ञात होता है कि परमात्मा की प्राप्ति में सभी का अधिकार है परंतु उक्त विषय के मर्म को न समझने के कारण बहुत से मनुष्य जिन्होंने श्रीगीता जी का केवल नाममात्र ही सुना है, कह देते हैं कि गीता तो केवल संन्यासियों के लिए ही है, वे अपने बालकों को भी इसी भय से श्री गीता जी का अध्ययन नहीं कराते कि गीता के ज्ञान से कदाचित लड़का घर छोड़कर संन्यासी न हो जाए किन्तु उनको विचार करना चाहिए कि मोह के कारण क्षात्र धर्म से विमुख होकर भिक्षा के अन्न से निर्वाह करने के लिए तैयार हुए अर्जुन ने जिस परम रहस्यमयी गीता के उपदेश से आजीवन गृहस्थ  रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया, उस गीताशास्त्र का यह उलटा परिणाम किस प्रकार हो सकता है?

अत: कल्याण की इच्छा चाहने वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बालकों को अर्थ और भाव के सहित श्री गीता जी का अध्ययन कराएं एवं स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान की आज्ञानुसार साधन करने में तत्पर हो जाएं।

श्रीमद् भगवद् गीता सब वेदों का सार है, समस्त वैश्विक संस्कृतियों का मूल है एवं सब धर्मों का आदर्श है। अत: जीवन के किसी भी क्षेत्र में परम संतुष्टि के लिए गीता से बढ़कर और बेहतर कोई दूसरा ग्रंथ नहीं। समस्त ब्रह्मांड के लोगों को यदि शांति, आनंद, तृप्ति प्राप्त करनी है तो गीता का अनुशीलन प्रासंगिक है।

                                                                                                                                                                             —डा. प्रणव


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