होलिका दहन पर घर से दूर करें अशुभ शक्तियों की बाधाएं

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Saturday, March 15, 2014-11:26 AM

होली का त्यौहर प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। फाल्गुन मास की सप्तमी तिथि से ही होली शुरु हो जाती है और उसकी धूम धूलैण्डी तक रहती है। होली की पहली रात को लकड़ियों तथा कंडों आदि का ढेर बनाकर होलिका दहन किया जाता है।

इस वर्ष 16 मार्च रविवार के दिन होलिका दहन का शुभ पर्व है। प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भ्रद्रारहित काल में होलिका दहन किया जाता है।16 मार्च को भद्रा काल की समाप्ति पश्चात होलिका-दहन किया जा सकता है इसलिए होलिका-दहन से पूर्व और भद्रा समय के पश्चात होली का पूजन करना शुभ है। ज्योतिष शास्त्र के मतानुसार व्रत, पर्व एवं त्यौहार पर पूजन शुभ मुहूर्त पर ही करना चाहिए।

 होलिका दहन से पूर्व होली की पूजा करते समय होलिका के समीप पूर्व या उतर दिशा की ओर मुख करके बैठें और पूजन करने के लिए निम्न सामग्री का प्रयोग करें

कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, नई फसल का कुछ भाग, सप्त धान्य, गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर

तदउपरांत होलिका के समीप गोबर से र्निमित ढाल तथा अन्य खिलौने रखें। गोबर से र्निमित ढाल व खिलौनों की चार मालाएं लें। प्रथम माला पितरों के नाम की, दूसरी हनुमान जी के नाम की, तीसरी शीतला माता के नाम की तथा चौथी अपने घर- परिवार के नाम की। कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर तीन अथवा सात परिक्रमा करते हुए लपेट दें। तदउपरांत लोटे का शुद्ध जल एवं पूजन की अन्य सामग्री को एक-एक करके होलिका को अर्पित करें।

 मान्यता है कि होलिका दहन की शेष बची अग्नि और राख को अगले दिन ब्रह्म मूर्हत के समय घर में लाने से घर को अशुभ शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है एवं शरीर पर इसका लेपन करने से सकारात्मकता का संचार होता है। होलिका दहन के समय सेकें गए धान्यों को खाने से शरीर में रोगों का नाश होता है।


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