संसार तथा सांसारिक वस्तुओं से ममता मिटाएं

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Tuesday, March 18, 2014-8:07 AM

व्यक्ति की जहां-जहां और जितनी-जितनी अधिक ममता अथवा लगाव होता है वहां-वहां और उतना-उतना उसे सुख-दुख महसूस होता है। भगवान के रास्ते चलने वालों के लिए ममता का त्याग करना अत्यन्त आवश्यक है। जो चीज खाने में या भोगने में प्यारी लगती है उसको बांटना चालू कर दो तो ममता मिटेगी।

वाहवाही प्यारी लगती है तो बड़ों के चरणों में बैठो। धन प्यारा लगता है तो कुछ हिस्सा दान करो। जिनको गुरु जी प्यारे लगते हैं  उनको चाहिए कि गुरु जी को, गुरु जी के ज्ञान को उनके साहित्य और सत्संग की रिकार्डिंग के माध्यम से बांटना शुरू कर दें तो वे गुरु जी के और प्यारे बन जाएंगे तथा करीब पहुंच जाएंगे।

विवेकानंद जी ने रामकृष्ण परमहंस जी के प्रसाद को देश-विदेश में बांटा। भगवान राम जी को वशिष्ठ जी ने जो सत्संग-अमृत का पान कराया था, उन अमृत वचनों से बना ‘श्री योग वशिष्ठ महारामायण’ नामक ग्रंथ आज भी जिज्ञासु भक्तों के लिए एक अति उत्तम ग्रंथ साबित हो रहा है।

गुरु के ज्ञान का प्रसाद बांटने से, गुरु के दैवीय कार्य में लगे रहने से संसार तथा सांसारिक वस्तुओं से ममता मिट जाती है और शिष्य के हृदय में प्रेम भक्ति का प्रसाद उत्पन्न होकर वह जीवन मुक्त पद पाने का अधिकारी बन जाता है।


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