कृष्णावतार

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Tuesday, March 18, 2014-8:22 AM

रात को प्रद्युम्र जी को दानव योद्धाओं ने अपना पकाया हुआ भोजन ला कर दिया परन्तु उन्होंने कुछ नहीं खाया। अगले दिन सुबह ही मुखिया लौट आया और उसने प्रद्युम्र जी से पूछा, ‘‘तुम लोग क्यों आए हो यहां?’’

‘‘मैं तुम्हारे महाराजाधिराज से भेंट करने आया हूं। बड़ी प्रशंसा सुन रखी है मैंने उनकी।’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘मैं पहले भी बता चुका हूं। तुम मुझे महाराज शाल्व के पास ले चलो। वहां पहुंच कर मैं उन्हें ही बताऊंगा।’’

‘‘तुम्हारे देश के योद्धाओं में तुम्हारी पदवी क्या है?’’ मुखिया ने फिर पूछा।

‘‘मैं महारथी हूं और यदि महाराज शाल्व द्वारिका पर आक्रमण करते तो रथियों की अगली दौड़ में मैं अब तक अतिरथी बन चुका होता।’’

‘‘महाराज ने मुझे जो जानकारी प्राप्त करने का आदेश दिया था वह सब मैं प्राप्त कर चुका हूं। अब फिर जा रहा हूं उनकी सेवा में। उन्हें लेकर मैं परसों प्रात:काल लौट आऊंगा। ये लोग हमारे अतिथि हैं। ऊंटों पर जो भोजन सामग्री लदी थी वह सब हमने छीन ली है। इसमें से थोड़ा-थोड़ा देना होगा इन्हें खाने के लिए। वह भी ऊंट पर लाद दो।’’ 

                                                                                                                                                                                       (क्रमश:)

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