नर से नारायण,पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग...

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Friday, March 21, 2014-7:00 AM

भगवान बुद्ध जब आत्म शान्ति की खोज में गृह त्याग कर निकलते हैं और आत्मा की प्राप्ति का मार्ग विभिन्न गुरुजनों से पूछते हैं तो उनका समाधान नहीं होता। अनेक प्रकार के मार्ग,अनेक विधान अनेक सिद्धान्त उन्हें विचलित कर देते हैं। ऐसी दशा में उनकी अन्तरात्मा एक ही उपाय सुझाती है कि तप करना चाहिए। तप के द्वारा ही अपने भीतर वह प्रकाश उत्पन्न होगा जिससे वस्तु स्थिति का स्पष्ट निरूपण हो सके।

लौकिक जीवन हो या आध्यात्मिक, पुरुषार्थ, श्रम, साहस, मनोयोग की ड़ड़ड़ बनाते हैं। तप ही सम्पूर्ण प्रगति का आधार है देवताओं के वरदान। जो र्सिफ और र्सिफ तपस्वीयों को ही सुलभ होते हैं। भारतीय धर्मशास्त्र एवं पुराण तप की महत्ता के वर्णनों से भरे पड़े है। ऐतिहासिक महामानवों, ऋषियों, तत्त्वदर्शियों, देवदूतों की प्रसिद्धि और सिद्धि का आधार तप का प्रकाश ही रहा है।

बीज तप कर वृक्ष बनता है, नर तप कर नारायण बनता है। पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बनने का यही मार्ग है। तप मनुष्य के दोषों के निवारण के लिए एक रसायन है। साधना स्वयं को सुघड़ बनाने का प्रयास है। साधना वही है जो साध्य को दिशा दे। तप साधना से निखरा व्यक्ति अनिवार्य निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सम्पत्तियां और विभूतियां लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देता है। यही प्रभु समर्पित जीवन है। ऐसा जीवन जीने वाला ही तपस्वी तथा देवोपम सिद्ध पुरुष कहलाने का अधिकारी है।

गृहस्थ जीवन में अनेक कष्ट हैं, छटपटाहट है।  आज का गृहस्थ राग-द्वेष और विषय कषाय में लिप्त रह कर सिर्फ शाब्दिक उपासना कर रहा है। तप द्वारा उस कष्ट का निवारण संभव है। संसार की वेदना को मिटाने के लिए तप रूपी औषधी का प्रयोग करना होगा। परमात्मा इस शरीर के भीतर ही शुभ्र ज्योति के रूप में विद्यमान है। वह सत्य,तप, ब्रह्मचर्य और विवेक द्वारा ही प्राप्त होता है। जिन्होंने अपने दोषों को दूर कर लिया है वे प्रयत्नशील साधक ही उसका दर्शन करते हैं।


 तपसा र्स्वगगमन भोगो दानेन जायते। ज्ञानेन मोक्षो विज्ञयस्तीर्थस्नानादधक्षयः॥


अर्थात् तप से स्वर्गलोक में जाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। दान से भोगों की प्राप्ति होती है। ज्ञान से मोक्ष मिलता है तथा तीर्थ स्थान से पापों का क्षय होता है।


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