कृष्णावतार

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Monday, March 24, 2014-7:50 AM

प्रद्युम्न जी ने जो मार्ग अपनाया था, उसे छोड़ कर मुखिया उन्हें किसी दूसरे ही मार्ग पर ले चला। शायद इसलिए कि ठीक रास्ते का उनको पता न चल पाए और उनके पीछे-पीछे भी जो लोग आ रहे हों वे भी इस मरुप्रदेश में ऊंटों के पैरों के निशान देख कर भटक जाएं।

इस प्रकार चक्कर देकर यात्रा करने में उन्हें चार दिन लग गए। केवल एक रात उन्होंने मार्ग में विश्राम किया और चौथे दिन जब सुबह के समय उन्होंने वहां से प्रस्थान किया तो सामने  से कुछ योद्धा आते दिखाई दिए। उनका मुखिया तो पांचों शस्त्रों से सजा हुआ था जबकि अन्य सबके पास केवल धनुष बाण ही थे।
उन सब ने प्रद्युम्र जी से बड़ा अच्छा बर्ताव किया। पांचवें दिन वे सब एक हरे-भरे बाग में पहुंचे।  वहां कई सेनानायकों ने उनका शानदार स्वागत किया। उनके प्रमुख का आदेश मिलने पर प्रद्युम्न जी के लिए नए वस्त्र लाए गए तो प्रद्युम्न जी सोच में पड़ गए कि कहीं यह उनकी चाल ही न हो।

परन्तु उनके मुखिया ने कहा कि, ‘‘इसमें कोई चाल नहीं है। तुम महाराजाधिराज से भेंट करने जा रहे हो। अपने मैले-कुचैले वस्त्रों में तुम उनसे किस प्रकार भेंट कर पाओगे?’’

छठे दिन ये लोग एक नगरी में प्रविष्ट हुए। जिस सड़क पर से वे लोग गुजरे उसके दोनों ओर चोटी के सेनाधिकारियों की हवेलियां थीं। सड़कें कूड़ा-कर्कट से भरी पड़ी थीं। नंगे बालक रेत-मिट्टी में खेलते घूम रहे थे। प्रत्येक घर के बाहर दो-चार ऊंट खड़े थे और ऊंटनियों को दुहा जा रहा था। बकरियां, भेड़ें और खच्चर भी थे।

                                                                                                                                                                               (क्रमश:)


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