जानें कैसे कर सकते हैं शनिदेव को प्रसन्न

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Saturday, March 29, 2014-10:42 AM

भगवान सूर्य और छाया के पुत्र शनिदेव की क्रूरता भरी दृष्टि के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन इस क्रूरता का कारण क्या है क्या यह जानते हैं आप? उनकी दृष्टि के क्रूर होने का कारण है उनकी पत्नी का उनसे क्रोधित होकर उनको श्राप देना।

ब्रह्मपुराण के अनुसार बचपन से ही शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे और उनका विवाह चित्ररथ जी की कन्या के साथ हुआ था। उनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी स्त्री थी। एक दिन वह पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से शनि देव के पास पहुंची मगर वह श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न थे। उन्हें अपनी पत्नी के आने का आभास न हुआ। वह उनकी प्रतीक्षा करते करते थक गई। अंत में क्रोधित होकर उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया कि आज से वह जिस पर भी अपनी दृष्टि डालेंगे। वह जल कर भस्म हो जाएगा।

जब शनिदेव का ध्यान टूटा तो उन्होंने अपनी पत्नी से क्षमा मांगी। पत्नी को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, लेकिन श्राप को खत्म करने की शक्ति उन में नहीं थी। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।


शनिदेव का वर्ण इन्द्रनीलमणी के समान है। यह मकर व कुम्भ राशि के स्वामी हैं। शनि का वाहन गीध है। शनि अपने हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। यह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं। इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। इनका सामान्य मंत्र है – “ऊँ शं शनैश्चराय नम:”।

शनि को ऐसे करें प्रसन्न


यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन व्रत शुरू कर सकते हैं, लेकिन श्रावण मास में शनिवार व्रत रखना अति मंगलकारी है। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए।

शनिवार के दिन शनिदेव के नाम से दीपोत्सर्ग करें। उनकी पूजा के बाद उनसे जानें अन-जानें जो भी आपसे पाप कर्म हुए हों उसके लिए क्षमा याचना करें। शनि की पूजा के बाद राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।


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