जानें, महिलाओं से पूर्व संतान उत्पन्न कौन करता था

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Saturday, March 29, 2014-10:45 AM

ऋतुमती होना और शिशु को जन्म देने का सौभाग्य स्त्रियों को प्राप्त है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगी की प्राचीन काल में स्त्रियों की बजाय पुरूषों को मासिक धर्म के दौर से गुजरना होता था और शिशु को जन्म देने का कार्य भी पुरूषों के द्वारा किया जाता था। सनातन धर्म के वेद पुराणों में वर्णित है कि जिस समय सृष्टि की रचना हुई तो सर्व प्रथम त्रिदेवों की उत्पत्ति हुई। श्री भगवान विष्णु जी ने अपनी नाभि में से ब्रह्मा जी को प्रगट किया।

श्री भगवान विष्णु जी ने सृष्टि के विस्तार का कार्य ब्रह्मा जी को दिया। ब्रह्मा जी ने उनकी आज्ञा को शिरोधाय करते हुए अपने योग बल से आठ संतानों को उत्पन्न किया। जिनमें से सात सप्तऋषि कहलाए और आठवें विष्णु भक्त नारद मुनि जी।
ब्रह्मा जी ने श्री विष्णु और शिव जी से कहा कि इस तरह सृष्टि के विस्तार में अत्यधिक समय लग रहा है। अत: किसी अन्य विकल्प को अपनाया जाए। जिससे सृष्टि का विस्तार शीघ्रता से हो सके।

ब्रह्मा जी की बात मान भगवान शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए और संसार में नारी स्वरूप का आगमन हुआ। भगवान शिव ने ब्रह्मा जी से निवेदन किया कि वो स्त्री और पुरूष के संभोग द्वारा सृष्टि का विस्तार करें।इसके लिए आवश्यक था कि स्त्री को मासिक धर्म हो। इससे पूर्व तक तो भगवान स्वंय मासिक धर्म के दौर से गुजरते थे।

माता पार्वती ने भगवान शिव जी से कहा कि,"यह जो पुरूषों के कपड़ों पर लाल-लाल छितराव होते हैं वह उन्हें बहुत भाते हैं इसलिए उन्हें भी ऐसे वस्त्र चाहिए।"

भगवान शिव ने पार्वती जी को बहुत प्रकार से समझाने का प्रयास किया कि ऐसा संभव नहीं है मगर पार्वती जी नहीं मानी। उनके हठ के आगे विवश होकर भगवान शिव जी ने पार्वती जी को वर दिया कि," आज से पुरूष नहीं बल्कि महिलाएं मासिक धर्म के दौर से गुजरेंगी और संतान उत्पन्न करेंगी।"

ईश्वर ने पृथ्वी पर अपने प्रतिकृति के रूप में मां को भेजा है। संसार में मां के समान कोई छाया, कोई सहारा और कोई रक्षक नहीं है। मां ईश्वर की बनायी गई सबसे महान कृति है। माता के प्रति सदा आदर, सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। विशेषकर वृद्ध अवस्था में माताओं के प्रति अत्यधिक श्रद्धा और स्नेह का प्रदर्शन किया जाना चाहिए।


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