पाकिस्तान के इस क्षेत्र में गिरे थे भगवान शिव के आंसू

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Saturday, March 29, 2014-10:45 AM

पाकिस्तान में कटासराज हिन्दुओं का पवित्र स्थान है। कहते हैं सती के वियोग में विह्वल भगवान शिव के दो आंसू गिरे थे। एक कटास राज में और दूसरा राजस्थान के पुष्कर राज में। कटास राज के कुंड का जल पीने पर ही यक्ष और युधिष्ठिर का संवाद हुआ था। महाभारत का यह प्रसंग कटास राज में हर साल दुनिया के कोने-कोने से हिंदुओं को शिवरात्रि महोत्सव में अर्चना करने यहां खींच लाता है।

श्रद्धा का प्रतीक है कटासराज। पौराणिक काल में कटास राज का यह सरोवर कभी ‘विषकुंड’ कभी ‘अमरकुंड’ और कभी ‘अमृत कुंड’ कहलाया। नमक और कोयले के पहाड़ों के बीच  पंजाब के चकवाल जिले का यह तीर्थ पूर्व में ‘चौ शैदनशाह’ और पश्चिम में ‘करियाला’ कस्बों के बीच स्थित है। महाभारत काल में अवश्य यह वीरान पहाड़ी क्षेत्र रहा होगा।  कोयले और नमक का तब आविष्कार नहीं हुआ होगा। दूर-दराज तक कहीं पानी होगा ही नहीं। पांडवों ने अवश्य किसी ऊंचे टीले पर चढ़ कर प्रकृति के इस अद्भुत चश्मे को देखा होगा।

निश्चय ही इस स्थान पर यक्षों-किन्नरों का निवास रहा होगा। पाकिस्तान का यह क्षेत्र नमक और कोयले की सदियों तक न खत्म होने वाली खानों से घिरा हुआ है। मुझे खेद हुआ कि इतना वैभवशाली इलाका हिंदुस्तान से अलग क्यों कर दिया। कटास राज लाहौर से 280 किलोमीटर दूर है परन्तु जिस सुंदर राष्ट्रीय राजमार्ग से इसे जोड़ा गया उससे इतनी लम्बी यात्रा चार घंटों में तय कर लेंगे इसका हमारे जत्थे के तीर्थ यात्रियों को आभास नहीं था। क्या कमाल का राष्ट्रीय राज मार्ग पाकिस्तानी सरकार ने लाहौर से पेशावर तक बनाया है।  यही एकमात्र छ: लाइनों वाला राष्ट्रीय राजमार्ग पाकिस्तान की लाइफ लाइन है। बाकी दाएं-बाएं जाने वाली ग्रामीण सड़कें पाकिस्तान में मुझे कच्ची दिखीं।

लाहौर से कटास राज तक जाते समय सड़क के दोनों ओर  मीलों दूर तक फैले गेहूं के जरखेज खेत देखे। मुझे हैरानी हुई कि किन्नू के बेशुमार बाग तो इन खेतों में थे परन्तु आम या टाहली के वृक्ष नहीं थे। हां किक्कर और बबूल जरूर भारी मात्रा में सड़क के दोनों ओर देखे।

पाकिस्तान विकास के क्षेत्र में अभी 1960 में ही अटका हुआ है। लाहौर से कटास राज तक लोग ठेठ पंजाबी बोलते हैं। उर्दू भले ही पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान है परन्तु पंजाबी बोलना उनकी शान दिखी, लिखते चाहे वे उर्दू लिपि में हैं। औरतें पाकिस्तानी पंजाब की गोरी-चिट्टी और मांसल देह वाली दिखीं। मैं सोचता था कि पाकिस्तानी नारी सिर से पैर तक पूर्णत: ढंकी होगी। पर मेरा अनुमान गलत निकला। इक्का-दुक्का छोड़ पाकिस्तानी बहनें उन्मुक्त-स्वच्छंद मिलीं। बहुसंख्या में पूरा मेकअप किए हुए। गरीब भी थीं पर बदसूरत नहीं। हां सिर जरूर सब ने ढंका हुआ था।

लोग सूटेड-बूटेड भी थे पर ज्यादातर अपने राष्ट्रीय परिधान पठानी सलवार-कमीज में। कारों और पहरावे का रंग पाकिस्तानी पंजाब में काला ही दिखा। आंसू बिस्तर पर जरूर बहे कि हमने पंचम पातशाही श्री गुरु अर्जुन देव की पवित्र समाधि, ननकाना साहिब, पंजा साहिब और करतारपुर जैसे पवित्र स्थान पाकिस्तान को दे दिए। वीरान पड़ी महाराजा रणजीत सिंह और दलीप सिंह की समाधों पर कोई फूल चढ़ाने वाला भी नहीं।

टीस तो उठी अपने ‘कृष्णा मंदिर’ को देख कर, परन्तु भाग्य पर किसका जोर चलता है। भगवान राम के सुपुत्र ‘लव’ के  बसाए लाहौर की बदली फिकाा में ‘लव-कुश’ को याद करने वाला कौन है वहां? फिर भी लाल कृष्ण अडवानी के प्रयत्नों से पाकिस्तान  सरकार ने कटास राज जैसे पवित्र तीर्थ स्थान की कुछ तो सुध ली। लॉन बना दिया, मंदिरों और ‘अमृत कुंड’ की मुरम्मत भी करवा दी। चाहे कटास राज पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग की निगरानी में है पर वहां एक स्थायी पंडित तो पूजा-पाठ के लिए रख दिया जाए।

कटास राज पर इस्लामी, बौद्ध और हिंदू संस्कृति का प्रभाव है। वहां स्थित बौद्ध-स्तूप, हरि सिंह नलवा का किला और राम दरबार तीनों संस्कृतियों का सुमेल है। खंडहर स्वरूप ही सही, शिवलिंग का वहां होना शैवमत के प्रभाव को दर्शाता है। कटास राज के कम्पलैक्स में सतगढ़ा मंदिर का पुनरुद्धार भी पाकिस्तान सरकार ने किया है।
 
मंदिरों के इन समूहों में प्राचीन हिंदू मूर्तियों का कहीं अता-पता नहीं। भारत के हिंदू मठाधीशों से, विभिन्न-विभिन्न हिंदू संगठनों को कटास राज के मंदिरों में मूर्तियों की पुन: स्थापना करवानी चाहिए। भारत और पाकिस्तान सरकार आपसी संबंधों के सुधारार्थ जब भी बात करें तो हिंदू-सिख और ईसाई भाईचारे के सभी तीर्थ स्थानों के रख-रखाव में भारत को भी भागीदार बनाए। जम्मू-कश्मीर का ही मुद्दा लेकर न रोते रहें, कोई धार्मिक, सामाजिक, और आपसी भाईचारे पर भी मिलें, बैठ कर विचार करें।

आजादी के बाद पाकिस्तान में कुल आबादी का 4.5 प्रतिशत हिंदू थे। आज एक प्रतिशत से भी कम रह गए हैं। वहां रह रहे हिंदुओं ने पाकिस्तान में ही रहने का साहसिक जोखिम उठाया था। उनका चुनाव वहीं टिके रहने का अनेक खतरों से भरा है। क्या पाकिस्तानी हिंदू-सिख अपनी अलग पहचान बना कर रख सके  या रख सकेंगे? हिंदू लड़कियों की शादियां, हिंदू मृतकों की अस्थियां भारत की गंगा में लाकर बहाना एक बड़ी समस्या है।

पाकिस्तान के नारोवाल जिले के एक वफद से जो शिवरात्रि मनाने कटासराज आया था, की  युवा लड़कियों ने रो-रोकर अपने मृतक पूर्वजों की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने का बड़ा मुद्दा भारत के तीर्थ यात्रियों के सामने रखा। कम से कम हिंदू पाकिस्तानी मृतक की अस्थियां तो गंगा में प्रवाहित करने का वीजा उन्हें मिलना चाहिए। वहीं कटास राज के दर्शन करने आए कराची और इस्लामाबाद के हिंदू डाक्टरों से मिला। उनमें से एक मैडीकल कालेज का हैड आफ डिपार्टमैंट भी था। चकवाल के एकमात्र हिंदू रविन्द्र कुमार का खुशहाल परिवार मिला। वह करियाला नगर निगम का सदस्य भी था, पर पूरी पाकिस्तानी वेशभूषा में।

पाकिस्तानी अधिकारियों का व्यवहार काफी सौहार्दपूर्ण था। हमारे  157 तीर्थ यात्रियों के निवास की व्यवस्था कटासराज के एक सरकारी कालेज में की गई थी। पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था।  तीर्थ यात्री पर कम से कम सात-आठ सुरक्षा कर्मी थे। इस बार के तीर्थ यात्रियों के लिए फ्री टैलीफोन सेवा पर्याप्त मात्रा में की गई थी पर कोई भी तीर्थ यात्री इस सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ नहीं सकता था। पांच तीर्थ यात्री लाहौर से ननकाना साहिब की तीर्थयात्रा पर चोरी-छिपे निकल गए  पर पकड़ लिए गए। इसी तरह कटास राज से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित कस्बा चौशैदनशाह की मजार पर मैं अपने एक साथी के साथ गया तो पकड़ लिया गया। अच्छा हुआ कि मुझे जेल नहीं भेजा।
पाकिस्तानी अधिकारियों और चकवाल जिले की संसद सदस्या श्रीमती सुलताना ने जहां हमारे जैसे पांच-छ: नेताओं का सिरोपा देकर स्वागत किया, वहीं सभी तीर्थ यात्रियों को रेवडिय़ों के एक-एक पैकेट से नवाजा गया।

लाहौर के गुरुद्वारे में जहां तीर्थ यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था थी वहां सूफी-गायिकी का भी प्रबंध किया गया। यह यात्रा 25 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च 2014 को समाप्त हुई। तीर्थ यात्रियों के मन में जाते समय जो भय था यात्रा की समाप्ति पर खत्म हो चुका था। मेरी निजी इच्छा अपने जन्मस्थान ‘मोरली’ जिला नारोवाल को सिजदा करने की थी परन्तु सुरक्षा कारणों से संभव नहीं हो सका पर एक दुख हमेशा सालता रहेगा कि हमने भारत का विभाजन क्यों स्वीकार किया। इतना उपजाऊ इलाका पाकिस्तान बना दिया।
 
                                                                                                                               —मा. मोहन लाल (पूर्व मंत्री पंजाब)


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