कृष्णावतार

  • कृष्णावतार
You Are HereDharm
Monday, March 31, 2014-8:30 AM

जब वे लोग यहां से रवाना हुए तो उन सब ने मार्ग में एक आदमी का हाथ पकड़ लिया और उससे कुछ पूछा। उस आदमी ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जितने लोग हैं वे सब हमारे बंदी हैं।’’

‘‘हम बंदी नहीं हैं। बंदी तो वे होते हैं जो युद्ध में पकड़े जाते हैं। हम से अभी तक किसी ने युद्ध नहीं किया है। जिसे जीवन प्यारा न हो वह जिस तरह चाहे मुझ से युद्ध कर ले।’’ प्रद्युम्न जी ने कहा।

‘‘मानता हूं तुम्हारी बात परन्तु जब युद्ध करने से कोई लाभ होने की संभावना न हो तो युद्ध करना बेकार है।’’ उस व्यक्ति ने हंसते हुए कहा, ‘‘महाराजाधिराज ने मुझे विशेष रूप से आदेश दिया है कि तुम्हारे शीश का एक बाल भी बांका न हो। मैं तुम्हारी देखभाल करने आया हूं।’’

‘‘और मेरे साथियों का क्या बनेगा?’’ प्रद्युम्न जी ने पूछा।

‘‘वे भी हमारे अतिथि होंगे। अच्छा अब चलो। हमें अभी कई योजन और चलना है।’’

रास्ते में जहां कहीं भी वे ठहरते वहीं उनके लिए भोजन और विश्राम का इस प्रकार प्रबंध कर दिया जाता जैसे राजाओं और राजकुमारों के लिए किया जाता है। जब धूप तेज हो गई तो एक सराय में कुछ देर विश्राम किया। उन दिनों धर्मशालाएं नहीं होती थीं। अंत में सारे ऊंट कच्ची मिट्टी के एक गढ़ (किला) के मुख्य द्वार के सामने पहुंच कर रुक गए।

उस व्यक्ति ने बताया कि, ‘‘अब हम महाराजाधिराज की राजधानी में पहुंच गए हैं। उसका नाम मात्रीकोदत्त है और मेरा नाम जानना चाहते हो तो सुनो मैं दुबरनाब हूं। सेना का अध्यक्ष और तुम तो प्रद्युम्न हो। कृष्ण वासुदेव के पुत्र।’’

इस पर वे दोनों एक-दूसरे को बुद्धू बनाने के प्रयत्न पर हंस पड़े।

                                                                                                                                                                                       (क्रमश:)
 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You