आज खुलेंगे ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के द्वार

  • आज खुलेंगे ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के द्वार
You Are HereDharm
Sunday, April 06, 2014-10:29 AM

या देवी सर्वभू‍तेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


अवतार वर्णन: आदिशक्ति पराम्बा के सातवें रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। नवरात्र की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की उपासना का विधान है। ब्रह्मा देव जी ने मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से अपनी प्राणों की रक्षा करने के लिए योगनिद्रा में लीन श्री भगवान (विष्णु) को निंद्रा से चेतन करने का प्रयास किया। अतः ब्रह्मा देव जी ने श्री भगवान को योगनिद्रा से जगाने के लिए कालरात्रि मंत्र से देवी की स्तुति की थी।

पौराणिक मतानुसार देवी कालरात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी यही हैं। देवी कालरात्रि ने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है। कालरात्रि शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है इसका संधिविच्छेद है काल + रात्रि। काल का अर्थ है (कालिमा यां मृत्यु) रात्रि का अर्थ है निशा, रात और अस्त हो जाना। अतः कालरात्रि का अर्थ हुआ काली रात जैसा अथवा काल का अस्त होना। अतः देवी कालरात्रि का वर्ण अंधकार की भांति कालिमा लिए हुए है।

स्वरुप वर्णन: शास्त्र अनुसार देवी कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयकारी है, देवी कालरात्रि का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए है। मां कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली हैं। इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। देवी कालरात्रि का रंग काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है इनका वर्ण अंधकार की भांति कालिमा लिए हुए है। देवी कालरात्रि का रंग काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है। शास्त्रों में देवी कालरात्रि को त्रिनेत्री कहा गया है।

 अतः इनके तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल हैं, जिनमें से बिजली की भांति किरणें प्रज्वलित हो रही हैं तथा देवी अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रख रही हैं। इनके बाल बाल खुले और बिखरे हुए हैं जो के हवा में लहरा रहे हैं। कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है। इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं।

 शास्त्रों में इन्हें चतुर्भुजी कहा गया है। इनकी चार भुजाएं हैं दाईं ओर की ऊपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। बाईं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है। शास्त्र अनुसार देवी कालरात्रि गर्दभ (गधे) पर वारविराजमान हैं। देवी कालरात्रि का विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा है।
 

साधना वर्णन: नवरात्र की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि के स्वरूप की ही उपासना की जाती है।  देवी कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है। सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इनका ध्यान इस प्रकार है

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥

योगिक दृष्टिकोण: नवरात्र की सप्तमी में साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है। कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। नवरात्र सप्तमी तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। इस दिन आदिशक्ति की आंखें खुलती हैं। नवरात्र सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी द्वार खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। इस दिन तांत्रिक मतानुसार देवी पर मदिरा का भोग भी लगाया जाता है।  

ज्योतिष दृष्टिकोण: देवी कालरात्रि की साधना का संबंध शनि ग्रह से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में शनि ग्रह का संबंध दशम और एकादश भाव से होता है अतः देवी कालरात्रि की साधना का संबंध करियर, कर्म, प्रोफेशन, पितृ, पिता, आय, लाभ, नौकरी, पेशे से है। जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में शनि ग्रह नीच, अथवा शनि राहू से युति कर पितृ दोष बना हो रहा है अथवा शनि मेष राशि में आकार नीच एवं पीड़ित है उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां कालरात्रि की साधना। मां कालरात्रि की साधना से व्यक्ति को आलस्य से छुटकारा मिलता है, भक्त का कर्म क्षेत्र मज़बूत होता है, पद्दोन्नति की प्राप्ति होती है, आय स्रोतों अच्छे होते हैं, लाभ क्षेत्र मज़बूत होता है।  इनके पूजन से शत्रुओं का संहार होता हैं। जिन व्यक्ति की आजीविका का संबंध कंस्ट्रक्शन, मिकेनिकल, इंजीनियरिंग, हार्डवेयर अथवा पशुपालन से हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है देवी कालरात्रि की साधना।

वास्तु दृष्टिकोण: देवी कालरात्रि कि साधना का संबंध वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार शनि ग्रह से है, इनकी दिशा पश्चिम है, निवास में बने वो स्थान जहाँ पर बेडरूम, जंक स्टोररूम, फ़ूड स्टोररूम हो अथवा जिन व्यक्तियों का घर पश्चिम मुखी हो अथवा जिनके घर पर पश्चिम दिशा में वास्तु दोष आ रहे हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है देवी कालरात्रि की आराधना।

उपाय: प्रोफेशन में सफलता और प्रमोशन के लिए देवी कालरात्रि को उड़द से बने माल पुए का भोग लगाएं।

आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: info@kamalnandlal.com


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You