कृष्णावतार

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Monday, April 07, 2014-11:32 AM

जब प्रद्युम्र जी तथा उनके साथी राजा शाल्व के सेनाध्यक्ष वज्रनाभ आदि के साथ शाल्व की राजधानी मातृकूट में प्रविष्टï हुए तो वहां बहुत लम्बे-चौड़े मकान देख कर आश्चर्य चकित रह गए। उन्हें एक बड़े कक्ष में ले जाया गया जो खूब अच्छी तरह सजा हुआ था। वे लोग जिस ओर भी जाते उन्हें दास-दासियों के जमघट हाथ जोड़े और सिर झुकाए खड़े मिलते थे।

यह मकान भी एक प्रकार की सराय ही था या उसे अतिथि गृह कह सकते हैं। राजा शाल्व से भेंट करने के लिए आने वालों को यहीं ठहराया जाता था। उस रात प्रद्युम्र जी तथा उनके साथियों को उसी अतिथि गृह में अलग-अलग कमरों में ठहराया गया।
इसके बाद प्रद्युम्र जी और उनके साथियों को एक अन्य बड़े कमरे में ले जाया गया। वहां स्नान करने के लिए अत्यंत निर्मल जल से भरा हुआ एक कुंड था। चूंकि उनके पास और कोई नहीं आया था इसलिए वे सब अपने वस्त्र उतार कर कुंड में तैरने लगे। उसी समय एक भारी-भरकम काले भुजंग सेवक ने जो द्वार पर खड़ा था, ताली बजाई और उसके ताली बजाते ही तत्काल 6 अत्यंत रूपवान दासियां उस कक्ष में आ गईं। उन रूपवती दासियों को देख कर प्रद्युम्र जी तथा उनके साथी कुंड में गोते लगा गए। उनके इस शर्मीलेपन से दासियां घृणापूर्वक हंसती हुई बाहर चली गईं।

प्रद्युम्र जी को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उन्हें भ्रम में डालने के लिए और वासनाओं में फंसाने के लिए प्रयत्न किए जा रहे हैं। इसके बाद प्रद्युम्र और उनके साथी वस्त्र पहन कर बाहर आ गए। उन्हें उनके कमरों में पहुंचा दिया गया और फिर कुछ सेविकाएं भोजन तथा जल लेकर आ गईं। प्रद्युम्र जी तथा उनके साथियों ने भोजन किया और उसके बाद कुछ देर में ही सब अपने-अपने बिछौनों पर पड़ कर गहरी नींद में सो गए।
                                                                                                                                                                                (क्रमश:)


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