पूजा-जप के समय सही विधि से करें आसन का प्रयोग, दरिद्रता और रोग न छोड़ेंगे साथ

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Thursday, April 20, 2017-10:03 AM

पूजा-अर्चना करते समय मनुष्य में एक विशेष प्रकार की शक्ति का संचार प्रकाशित होता है। इसके माध्यम से मनुष्य प्रभु की कृपा को शीघ्राति पाने में सक्षम हो जाता है। यह शक्ति निकलकर पृथ्वी में न जाए इसलिए पूजा-जप करने वाले व्यक्ति और भूमि के बीच कुचालक के रूप में आसन का प्रयोग करना अत्यंत उपयोगी है। पूजा-जप और धार्मिक अनुष्ठान करने से व्यक्ति के भीतर एक विशेष प्रकार के आध्यात्मिक शक्ति-पुंज का संचय होता है। इसी शक्ति संचय के कारण इष्टबली साधक के चेहरे पर प्रकाशमय तेज की विशेष प्रकार की चमक प्रकट हो जाती है। साधक को बिना आसन के पूजा-जप आदि नहीं करना चाहिए। इसका पूर्ण फल भूमि में समाहित हो जाता है और साधक को कोई लाभ नहीं मिल पाता। 


‘ब्रह्माण्ड पुराण’ में आसनों का विशेष उल्लेख विस्तारपूर्वक किया गया है। जिस आसन पर कोई साधक साधना कर चुका है, साधना के लिए पुन: आसन का प्रयोग न करें। दूसरे के द्वारा प्रयुक्त आसन में दोष आ जाते हैं। जो नए साधक के लिए शुभ और मंगल नहीं होता। इसलिए साधना के लिए साधक को सदैव नवीन आसन पर ही बैठकर पूजा-तप करना चाहिए। पूजा-तप करने से पहले उस आसन को मंत्र द्वारा शुद्ध और पवित्र कर लेना चाहिए। संपूर्ण स्थानों और दिशाओं के पश्चात जो मध्य हो उसे सर्वोच्च एवं ब्रह्म स्थान कहते हैं। इसी ब्रह्म स्थान पर ही साधक को साधना करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है।


बिना आसन के साधक को धार्मिक कृत्यों-अनुष्ठानों में सिद्धि प्राप्त नहीं होती। पूजा-जप के समय आसन का प्रयोग शास्त्रों के अनुसार न करने पर उसका फल साधक को प्राप्त नहीं होता है। जैसे कि ‘ब्रह्मांड पुराण’ में वर्णित है-


खाली भूमि पर बैठ कर पूजा-पाठ-जप करने से मनुष्य को दरिद्रता की प्राप्ति होती है।


साधक बांस के आसन बनाकर पूजा-जप करता है तो उसे दुर्भाग्य की प्राप्ति होती है।


पत्थर के आसन पर पूजा-जप करने से मनुष्य को अत्यधिक रोग होता है।


तिनकों से बने आसन पर पूजा-जप से सदैव धन हानि होती है।


पत्तों से निर्मित आसन पर पूजा-जप करने से मानसिक विभ्रम उत्पन्न होता है तथा अनेक प्रकार का कष्ट मिलता है।


लकड़ी के आसन पर बैठकर जो मनुष्य पूजा-जप करता है उसे दुख और अशांति की प्राप्ति होती है।


खुली भूमि पर बैठकर साधना करने से साधक को कष्ट होता है।


घास-फूस पर बैठकर जो साधक जप-तप करता है उसे उपमर्श की प्राप्ति होती है।


जो साधक पद पर बैठकर पूजा-पाठ करता है उसको तपस्या करने में अनेक प्रकार की कठिनाइयां और बाधा उत्पन्न होती हैं।


कपड़ों से निर्मित आसन पर जो साधक जप-पूजा करता है उसे चिंता और बाधा उत्पन्न होती है।


विभिन्न प्रकार के आसनों का महत्व वेद-शास्त्रों में वर्णित है। ऋषि-मुनियों ने कुश आसन, मृगचर्म आसन, कम्बल आसन और व्याघ्रचर्म आसनों को सर्वोच्च श्रेणी में दिव्य लाभ और महत्व प्रदान किया है-

 

कुश आसन- जो साधक कुश आसन पर बैठकर मंत्र-जप की साधना करता है, उसे शुचिता, तन्मयता और स्वास्थ्य में सदैव वृद्धि होती है। उसे अनंत फल प्राप्ति सदैव होती है। विशेष फलदायक और पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति होती है।


मृगचर्म आसन-जो साधक इस आसन पर बैठकर साधना करता है, उन्हें मोक्ष तथा धन की प्राप्ति होती है। 


कम्बल आसन-कर्म सिद्धि की पूर्ण लालसा के लिए किए जाने वाले जप में कम्बल आसन सर्वोच्च लाभप्रद सिद्धदायक होता है।


व्याघ्रचर्म आसन-यह रजोगुणी आसन है, जिसे राजसिक वृत्ति वाले साधकों द्वारा राजसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस आसन पर बैठकर जो साधना करता है, उसे विषैले जन्तुओं का कोई भय नहीं रहता। र्निवघ्न साधना के लिए यह आसन विशेष लाभकारी एवं उपयोगी है।

 

 

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