श्रीमद्भगवद्गीता: मृत्यु पर पाएं विजय, बनेंगे वैकुंठ के अधिकारी

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Thursday, November 03, 2016-12:08 PM

श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप व्यायाकार : स्वामी प्रभुपाद अध्याय 5 (कर्मयोग)

भगवान आसक्ति या घृणा से रहित


इहैव तैॢजत: सर्गो येषां साये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्राह्मणि ते स्थिता:।।19।।


शब्दार्थ- इह—इस जीवन में; एव—निश्चय ही; तै:—उनके द्वारा; जित:—जीता हुआ; सर्ग:—जन्म तथा मृत्यु; येषाम्—जिनका; साये—समता में; स्थितम् —स्थित; मन:—मन; निर्दोषम्—दोषरहित; हि—निश्चय ही; समम्—समान; ब्रह्म—ब्रह्म की तरह; तस्मात्—अत:; ब्रह्मणि—परमेश्वर में; ते—वे; स्थिता:—स्थित हैं।;


अनुवाद : जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं, उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बंधनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं।


तात्पर्य: जैसा कि ऊपर कहा गया है मानसिक समता आत्म-साक्षात्कार का लक्षण है जिन्होंने ऐसी अवस्था प्राप्त कर ली है, उन्हें भौतिक बंधनों पर विशेषकर जन्म तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त किए हुए मानना चाहिए। जब तक मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानता है, वह बद्धजीव माना जाता है, किंतु ज्यों ही वह आत्म-साक्षात्कार द्वारा समचित्तता की अवस्था को प्राप्त कर लेता है,वह बद्धजीवन से मुक्त हो जाता है। 


दूसरे शब्दों में, उसे इस भौतिक जगत में जन्म नहीं लेना पड़ता, अपितु अपनी मृत्यु के बाद वह आध्यात्मिक लोक को जाता है। भगवान निर्दोष हैं क्योंकि वे आसक्ति अथवा घृणा से रहित हैं। इसी प्रकार जब जीव आसक्ति अथवा घृणा से रहित होता है तो वह भी निर्दोष बन जाता है और वैकुंठ जाने का अधिकारी हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए। 

 (क्रमश:)


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