बीकानेर के बड़े गणेश: मनोवांछित फलों से भरते हैं हर भक्त की झोली

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Wednesday, July 26, 2017-7:58 AM

छोटी काशी के नाम से विख्यात बीकानेर अपने धर्मपरायण स्वरूप के लिए जाना जाता है। इस छोटी काशी का पश्चिमी हिस्सा धर्म भूमि के रूप में देखा जाता है। मठों, मंदिरों, बगीचियों का यह क्षेत्र एक प्रकार से तीर्थों का गढ़ है। रियासत काल के राजाओं ने भी बीकानेर की जनता की धार्मिक भावना का पूरा-पूरा आदर-सम्मान किया। प्रात:काल से परकोटे के भीतर वैदिक मंत्रों का सस्वर उच्चारण सुनकर, बाहर से आए संतों ने इस शहर को छोटी काशी की उपमा दी थी। यह उक्ति जन मान्यता के रूप में फैलती गई और आज बीकानेर की पहचान देश की छोटी काशी के रूप में होने लगी है। महाराजा अनूप सिंह बीकानेर के लोकप्रिय राजाओं में से एक थे। उनके शासनकाल में संस्कृत भाषा का प्रचुर साहित्य रचा गया था। महाराजा अनूप सिंह स्वयं संस्कृत अनुरागी थे। उन्होंने स्वयं साहित्य सृजन किया। उनकी कृतियां अनूप संस्कृत पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित हैं।


महाराजा अनूप सिंह के समय में जूनागढ़ के हर मंदिर में किसी जटिल बात के कारण कथावाचक व्यास की समस्या आ खड़ी हुई थी। पूर्व में यह कथा लालाणी व्यास जाति द्वारा की जाती। जूनागढ़ के ‘हर मंदिर’ के तात्कालिक पुजारी आचार्य धरणीधर तथा महानंद हुआ करते थे। महाराजा अनूप सिंह ने ‘हर मंदिर’ की कथा समस्या उन्हें बताई। तब आचार्य धरणीधर तथा महानंद भ्राताओं ने मेड़ता से गोलवाल पारिक व्यास महाकवि हरिद्विज एवं हरिदेव को बुलाकर उन्हें ‘हर मंदिर’ की कथा व्यवस्था सुपुर्द करवाई तथा महाराजा अनूप सिंह ने उन्हें ससम्मान बीकानेर में बसाया। धीरे-धीरे गोलवाल पारिक व्यास जाति ने अपनी विद्वता से जनसामान्य को भी प्रभावित कर लिया। फलस्वरूप उन्हें जनता के भीतर भी कथावाचन तथा गरुड़ पुराण वाचन का कार्य मिल गया। इस प्रकार गोलवाल पारिक व्यास जाति की आर्थिक स्थिति भी उन्नत होती गई।


हरिदेव के पुत्र पं. शिवराम ने वि.सं. 1760 के लगभग नत्थूसर गेट के बाहर एक बगीची का निर्माण करवाया और फिर वहां गणेश मंदिर की स्थापना की। यह कथा व्यासों की बगीची कालान्तर में बड़ा गणेश मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो गई। संस्कृत सम्भाषण में दक्ष 80 वर्षीय पंडित जयनारायण व्यास बताते हैं कि बड़ा गणेश मंदिर का परिक्षेत्र लगभग 13500 गज है। इस विशाल परिक्षेत्र में भगवान गणेश के अलावा सिद्धेश्वर महादेव, पातालेश्वर महादेव, कोडाणा भैरू के मंदिर भी स्थित हैं। गोलवाल पारिक व्यासों के पांच नगाड़े भी इसी परिक्षेत्र में स्थित हैं। प्रारंभ में यहां की पूजा का दायित्व शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को सौंपा गया था। महाराजा गंगा सिंह जी के समय में इस भव्य लम्बे-चौड़े परिसर का पट्टा बनाया गया जिसकी फाइल में भी शाकद्वीपीय ब्राह्मणों द्वारा गणेश जी की पूजा करने का उल्लेख है।


बीकानेर रियासत के सुप्रसिद्ध राजा गंगा सिंह जी की पुत्रवधू का प्रसव होने वाला था, ऐसे में गोलवाल पारिक व्यास गोपीकिसन ने उन्हें पोता होने का आशीर्वाद दे दिया था। जब युवरानी को प्रसव पीड़ा हो रही थी उस समय पंडित गोपीकिसन जी व्यास गोलवाल भगवान गणेश के मंदिर में ध्यानस्थ थे। वह यही प्रार्थना कर रहे थे कि महाराजा के पोता हो। भगवान गणेश ने भक्त की सुनी। महाराजा के पोता हुआ, फलस्वरूप गढ़ में थालियां गूंज उठीं। महाराजा साहब गंगा सिंह जी ने इसे गणेश जी का चमत्कार माना। पश्चात वे बड़ा गणेश मंदिर दर्शन करने गए, जहां उन्होंने उस समय 251 रुपए भेंट स्वरूप प्रदान किए। उन रुपयों से चांदी की सुंदर ‘बंगली’ भगवान गणेश के विग्रह हेतु बनवाई गई थी। इस चांदी की बंगली का विगत कुछ वर्षों पूर्व जीर्णोद्धार करवाया गया। जीर्णोद्धार करवाने के पश्चात उसे पुन: भगवान गणेश के मंदिर में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री डा. बी.डी. कल्ला के हाथों स्थापित करवाया गया। भाद्रपद गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश के विग्रह के बाहर यह बंगली रखी जाती है। सामान्य दिनों में यह ट्रस्ट के भंडार में रहती है। रात्रि के समय में आज भी पोढ़ावणा से पूर्व पारिक व्यास समाज के लोगों द्वारा प्रतिदिन भजन गाए जाते हैं जिसमें इस बात का उल्लेख आता है-


इस पूजन के पश्चात, आपको दिया गणपति पोता। जद बाजयो गढ़ में सुवर्ण थाल, मनाऊं गणपति दीनदयाल।।


भगवान गणेश का यह मंदिर बीकानेर की जनता का प्राणाधार है। प्रतिदिन सैंकड़ों की तादाद में भक्तगण यहां दर्शनार्थ आते हैं। प्रत्येक सप्ताह बुधवार के दिन यहां भारी भीड़ रहती है। बुधवार के दिन मंदिर के बाहर अहाते में फूलमालाओं, मोदकों की अस्थायी दुकानें लगती हैं। बड़ा गणेश मंदिर का परिक्षेत्र बहुत विस्तृत है। इस विस्तृत परिसर की तीनों दिशाओं में द्वार बने हैं केवल पश्चिम दिशा की तरफ मंदिर परिसर में प्रवेश करने का रास्ता नहीं है।


भगवान गणेश का मंदिर इस विस्तृत भू-भाग के पश्चिमी छोर पर स्थित है। गणेश जी के मंदिर में प्रवेश करने पर लम्बा-चौड़ा प्रांगण आता है। यह प्रांगण आधा खुला तथा आधा ढंका हुआ है अर्थात प्रांगण के अद्र्ध भाग में छत के रूप में लोहे के बड़े-बड़े सुराखों वाली जालियां लगी हुई हैं उसके पश्चात का प्रांगण पट्टियों से आच्छादित है। प्रांगण में प्रवेश करते ही बाईं ओर करणी माता का लघु मंदिर है तथा दाहिनी ओर प्रांगण के अंतिम छोर पर हनुमान जी की प्रतिमा है। पश्चात आता है सभामंडप। गर्भगृह में संगमरमर की चौकी के ऊपर भगवान गणेश विराजमान हैं। रामपुरिया जैन पी.जी. कालेज के सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो. राधाकृष्ण रंगा के अनुसार भगवान गणेश का यह विग्रह लगभग अढ़ाई फुट चौड़ा तथा सवा तीन फुट ऊंचा है। इस आकर्षक विग्रह की चार भुजाएं हैं जिनमें क्रमश: गदा, फरसा, माला, मोदक है।


भगवान साधक की मुद्रा में बैठे हैं। भगवान के विग्रह में सर्प लिपटा हुआ है। गले में जनेऊ है, भगवान का एक दांत है सूंड बाईं ओर है। यह विग्रह आकर्षक लाल पत्थर पर तराशा हुआ है। विग्रह में भगवान गणेश अपने हाथ से ही मोदक का आहार कर रहे हैं। भगवान के ललाट पर चंद्रमा है। साधक अवस्था में भगवान को धोती पहने हुए दिखाया गया है। भगवान के इस विग्रह का निर्माण बारह पुष्य नक्षत्रों के दौरान किया गया है। पुष्य नक्षत्र 27 दिनों में एक बार आता है। कलाकार द्वारा प्रत्येक पुष्य नक्षत्र को मूर्त तराशने का कार्य किया गया। 


बाहरी परिवेश में भगवान का जम कर शृंगार किया हुआ था। सिर पर कृत्रिम मुकुट तथा गले में विधि प्रकार के पुष्पों की मालाएं सुशोभित हो रही थीं। भगवान के विग्रह के निम्र भाग में सफेद रंग की वास्तविक धोती पहनाई हुई थी जो बीकानेर के इस एकमात्र मंदिर में ही दर्शनीय है। भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को मंदिर में पांव रखने तक की जगह नहीं रहती। उस दिन यहां भारी मेला लगता है।


भगवान गणेश का यह मंदिर कन्याओं के लिए अभीष्ट सिद्ध हुआ है यहां कुंवारी कन्याएं प्रतिदिन दर्शन करने आती हैं तथा मनोवांछित वर की कामना करती हैं। योग्य व गुणी वधू की तलाश में लड़के वाले यहां दर्शन करने के लिए अवश्य आते हैं। भगवान गणेश का यह मंदिर सभी प्रकार से मनोवांछित फल देने वाला है। आज इस मंदिर की देखभाल पारिक व्यास (गोलवाल) समाज करता है।

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