Kundli Tv- क्या आप जानते हैं कुंभकर्ण के 6 महीने सोने का राज़

Edited By Jyoti,Updated: 04 Dec, 2018 04:35 PM

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कुंभकर्ण, इसे कौन नहीं जानता। रावण का भाई कुंभकर्ण अपने सोने और खाने के लिए ही जाना जाता था। परंतु इसके साथ ही इसे रामायणकाल के प्रमुख पात्रों में से भी एक बताया गया है। आपको बता दें कि कुंभकर्ण रावण का छोटा भाई और ऋषि विशर्वा और राक्षसी कैकसी का...

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कुंभकर्ण, इसे कौन नहीं जानता। रावण का भाई कुंभकर्ण अपने सोने और खाने के लिए ही जाना जाता था। परंतु इसके साथ ही इसे रामायणकाल के प्रमुख पात्रों में से भी एक बताया गया है। आपको बता दें कि कुंभकर्ण रावण का छोटा भाई और ऋषि विशर्वा और राक्षसी कैकसी का पुत्र था। बचपन से ही बड़े कान होने के कारण इसका नाम कुंभकर्ण रखा गया था। जिसका मतलब है कुंभ यानि घड़ा और कर्ण यानि कान। इनकी माता कैकसी राक्षस वंश की थी और पिता ब्राह्मण कुल के। कुंभकर्ण में माता-पिता दोनों के गुण विद्यमान थे। 

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आप सभी को ये तो पता ही होगा कि कुंभकर्ण छः महीने सोता रहता था और फिर छः महीने खाता रहता था और फिर सो जाता। परंतु ब्रह्मा जी ने इसे सचेत किया कि अगर कोई इसे बलपूर्वक उठाएगा तो वही दिन कुंभकर्ण का अंतिम दिन होगा। लेकिन बहुत से लोग आज भी यह जानना चाहेंगे कि वह इतने दिन तक क्यों सोता था। आइए जानते हैं कुंभकर्ण के 6 महीने सोने के पीछे क्या वजह बताई जाती है- 
 

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पौराणिक कथाओं के अनुसार कि रावण, कुंभकर्ण और विभीषण ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कड़ी तपस्या की थी, जिसके बाद बह्मा जी ने कुंभकर्ण को निद्रासन यानि 6 महीने सोने का वरदान दिया था। ब्रह्मा द्वारा दिए गए इस वरदान के पीछे दो वजह बताई जाती हैं। 

पहली वजह
रामायण में दिखाए गए एक किस्से के मुताबिक इंद्र कुंभकर्ण से ईर्ष्या करते थे। उन्हें डर था कि कुंभकर्ण ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे कोई ऐसा वरदान न मांग ले जो उनके और बाकी देवताओं के लिए परेशानी खड़ी कर दे इसलिए उन्होंने मनचाहा वरदान मांगने से पहले कुंभकर्ण की मति भ्रष्ट कर दी और कुंभकर्ण ने इंद्रासन के बजाए निद्रासन वरदान मांग लिया।
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दूसरी वजह
दूसरी वजह में कुंभकर्ण का बहुत ज्यादा भोजन करना बताया जाता है। कहा जाता है कि सभी देवताओं और ब्रह्मा जी को लगता था कि अगर कुंभकर्ण इसी तरह भरपेट भोजन करता रहा तो बहुत जल्द दुनिया खत्म हो जाएगी। इसलिए देवताओं ने माता सरस्वती से प्रार्थना की जब कुंभकर्ण वरदान मांगे तो वे उसकी जीभा पर बैठ जाएं। माता सरस्वती ने उनकी बात मान ली और जब कुंभकर्ण ब्रह्मा जी से वरदान मांगने लगे वो उसकी जीभा पर विराजमान हो गई। इसी कारण कुंभकर्ण ने इंद्रासन के बजाए निद्रासन का वरदान मांग लिया। ब्रह्मा जी ने उसकी ये इच्छा पूरी कर दी। 
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