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गुप्त नवरात्र: जितना अधिक गोपनीय विधि से करेंगे पूजन, उतनी ज्यादा फलेगी सिद्धि

  • गुप्त नवरात्र: जितना अधिक गोपनीय विधि से करेंगे पूजन, उतनी ज्यादा फलेगी सिद्धि
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Wednesday, January 17, 2018-10:45 AM

हिन्दू धर्म में नवरात्रों का अत्यधिक महत्व है तथा साल में दो बार जहां लोग मां भगवती दुर्गा की कृपा पाने के लिए नवरात्रे बड़ी धूमधाम से मनाते हैं वैसे ही साल में 2 बार गुप्त नवरात्रे भी मनाए जाते हैं। चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में जैसे मां की विधिवत पूजा स्तुति की जाती है वैसे ही देवी भागवत के अनुसार आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में गुप्त नवरात्रे आते हैं। आषाढ़ मास के नवरात्रे भारत के दक्षिण में और माघ मास के गुप्त नवरात्रे उत्तरी भारत में मनाए जाते हैं, जिन्हें साधक किसी विशेष साधना की प्राप्ति के लिए मनाते हैं। माघ मास के नवरात्रे 18 से 26 जनवरी तक मनाए जाएंगे। पंचांग भेद के कारण कुछ विद्वान 17 से इन नवरात्र का आरंभ मान रहे हैं। जैसे चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मां दुर्गा के नौं रूपों की पूजा नियम से की जाती है वैसे ही इन गुप्त नवरात्रों में विशेष लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधना की जाती है तथा इन नवरात्रों में 10 महाविद्याओं की साधना का महत्व है। 


क्या है विधि- पहले दिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर मंदिर में मां की जोत गाय के घी के साथ जलाएं, शुद्घ मिट्टी रखकर वहां मिट्टी, पीतल अथवा तांबे के जल से भरे घट की स्थापना करें। मिट्टी में जौं भी डालें, जिन पर पवित्र जल का छिडक़ाव करें। घट में सिक्के डालें, उसके इर्द-गिर्द मौली बांधे, पुष्प माला रखें, पात्र को ढक्कन से ढक कर आम के 5 पत्ते रखकर उस पात्र के ऊपर पानी वाला नारियल लाल कपड़े में लपेट कर रखें, सुपारी, साबुत चावल छिडक़े तथा मां दुर्गा के विभिन्न रूपों का ध्यान करते हुए दुर्गा स्तुति मंत्र का जाप भी करें। घट स्थापना से पूर्व श्री गणेश जी का ध्यान करते हुए रौली से स्वास्तिक भी बनाएं। इन दिनों में भी मां की अखंड जोत जलाई जाती है। वैसे तो नौ दिनों तक दुर्गासप्तशति का पाठ करना चाहिए परंतु यदि समय का अभाव हो तो सप्त श्लोकी दुर्गा पाठ ही कर लेना चाहिए। 


ध्यान रखें- गुप्त नवरात्रि में पूजन को गुप्त रूप से करें। मन की इच्छा को अपने तक रखें ये साधना जितनी अधिक गोपनीय होगी, सिद्धि उतनी ज्यादा फलेगी। 

वीना जोशी
veenajoshi23@gmail.com

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