अप्सरा पुत्र हनुमान जी की मां थी कुंवारी!

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Monday, November 07, 2016-2:40 PM

झारखंड में रांची से करीब 140 किमी. की दूरी पर गुमला जिला हनुमान जी का ननिहाल है। इस स्थान पर हनुमान जी की माता अंजनि ने लम्बे अर्से तक निर्वाह किया था क्योंकि उन्हें कुंवारी मां बनने का और अप्सरा होते हुए भी वानरी बन जाने का श्राप मिला था।


सैंकड़ों वर्ष बीतने के बाद आज भी माता अंजनि और हनुमान जी की निशानियों के दर्शन भक्तों को व्यग्र करते हैं। इन घने और सुनसान जंगलों के मध्य जाना बहुत कठिन और जोखिम भरा है। जो भी भक्त यहां तक पंहुचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं उन्हें प्राप्त होती है असीम शांति और ऊर्जा।


झारखण्ड के घने जंगलों में अवस्थित इस स्थान पर अपनी माता की गोदी में बैठे हैं अंजनिपुत्र हनुमान। इस वन में कठिन तपस्या करके माता अंजनि ने हनुमान जी जैसे बलशाली पुत्र की प्राप्ति की थी।


यहां पर रहने वाले आम जन मानस की मान्यता है की इस स्थान पर करीब 360 सरोवर और 360 शिवलिंग अवस्थित हैं। जब माता अंजनि इन घने जंगलों में तपस्या कर रही थी तो वह हर रोज नए-नए सरोवर में स्नान कर अलग-अलग शिवलिंग की पूजा करती थीं। पुराणों में वर्णित है कि माता अंजनी को श्राप था कि वो कुंवारी मां बनेंगी इसलिए उन्होंने सुनसान जंगल का चुनाव किया ताकि किसी पर-पुरुष की दृष्टि उन पर न पड़े। उनके तप से खुश होकर ही भगवान शिव ने उनके गर्भ से ग्यारहवे रूद्र अवतार के रूप में जन्म लिया।


एक अन्य कथा के अनुसार हनुमान जी की माता अंजनि अपने पूर्व जन्म में स्वर्ग के राजा इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। वो बहुत खूबसूरत और चुलबुले व्यक्तित्व की स्वामी थी। एक बार नादानी में आ कर उन्होंने परम तेजस्वी ऋषि के साथ अशिष्टता भरा व्यवहार किया। क्रोध में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दिया कि वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा। ऋषि के मुख से श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि के चरणों में गिर गई और उनसे क्षमा मांगने लगी। ऋषि को उस पर दया आ गई। तब ऋषि ने कहा कि वानरी होने पर भी तुम्हारा रूप परम शोभायमान होगा और तुम्हारी कोख से ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी प्रभुता और ख्याति से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक चिरजीवी रहेगा।


मान्यता है कि इस स्थान पर आने से और माता अंजनि और हनुमान जी के दर्शनों से ही भक्तों की सभी मुरादें पूर्ण होती हैं। संतानहीन दंपतियों को अवश्य ही संतान प्राप्ति का वर मिलता है।

आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com


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