वास्तु दोष आपके घर में भी पैदा कर रहा है ये Problems, नियमित करें इनका पूजन

Edited By Punjab Kesari,Updated: 29 Aug, 2017 11:36 AM

how to avoid vastu dosh

वास्तु दोष व्यक्ति को गलत मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। आपके घर का वास्तु ठीक नहीं है तो आपकी संतान बेटा हो या बेटी वे अपना रास्ता भटक सकते हैं और गलत फैसले लेकर अपना जीवन तबाह कर सकते हैं। यहां

वास्तु दोष व्यक्ति को गलत मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। आपके घर का वास्तु ठीक नहीं है तो आपकी संतान बेटा हो या बेटी वे अपना रास्ता भटक सकते हैं और गलत फैसले लेकर अपना जीवन तबाह कर सकते हैं। यहां तक कि घर से भाग जाने का साहस भी कर सकते हैं। वास्तु दोष सबसे पहले मन और दिल को प्रभावित कर बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं। सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है क्योंकि वास्तु की दृष्टि से हर दिशा का अपना एक अलग महत्व है।


पूर्व दिशा 
पूर्व की दिशा सूर्य प्रधान होती है। सूर्य का महत्व सभी देशों में है। पूर्व सूर्य के उगने की दिशा है। सूर्य पूर्व दिशा के स्वामी हैं। यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश, अध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है। पूर्व दिशा पिता का स्थान भी है। पूर्व दिशा बंद, दबी, ढंकी होने पर गृहस्वामी कष्टों से घिर जाता है। वास्तु शास्त्र में इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर पूर्व दिशा को खुला छोडऩे की सलाह दी गई है।


दक्षिण दिशा 
दक्षिण दिशा यम की दिशा मानी गई है। यम बुराइयों का नाश करने वाला देव है और पापों से छुटकारा दिलाता है। पितर इसी दिशा में वास करते हैं। यह दिशा सुख-समृद्धि और अन्न का स्रोत है। यह दिशा दूषित होने पर गृहस्वामी का विकास रुक जाता है। दक्षिण दिशा का ग्रह मंगल है और मंगल एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है।


उत्तर दिशा 
यह दिशा मातृ स्थान और कुबेर की दिशा है। इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है। उत्तर में खाली स्थान न होने पर माता को कष्ट आने की संभावना बढ़ जाती है।


दक्षिण पूर्व की दिशा 
इस दिशा के अधिपति अग्नि देवता हैं। अग्निदेव व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी, सुंदर और आकर्षक बनाते हैं और जीवन में सभी सुख प्रदान करते हैं। जीवन में खुशी और स्वास्थ्य के लिए इस दिशा में ही आग, भोजन पकाने तथा भोजन से संबंधित कार्य करना चाहिए। इस दिशा के अधिष्ठाता शुक्र ग्रह हैं।


उत्तर पूर्व दिशा 
यह सोम और शिव का स्थान है। यह दिशा धन, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य देने वाली है। यह दिशा वंश में वृद्धि कर उसे स्थायित्व प्रदान करती है। यह दिशा पुरुष व पुत्र संतान को भी उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है और धन प्राप्ति का स्रोत है। इसकी पवित्रता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।


दक्षिण पश्चिम दिशा 
यह दिशा मृत्यु की है। यहां पिशाच का वास होता है। इस दिशा का ग्रह राहू है। इस दिशा में दोष होने पर परिवार में असमय मौत की आशंका बनी रहती है।


उत्तर पश्चिम दिशा 
यह वायुदेव की दिशा है। वायुदेव शक्ति, प्राण, स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। यह दिशा मित्रता और शत्रुता का आधार है। इस दिशा के स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं।


पश्चिम दिशा 
यह वरुण का स्थान है। सफलता, यश और भव्यता का आधार यह दिशा है। इस दिशा के ग्रह शनि हैं। लक्ष्मी से संबंधित पूजा पश्चिम की तरफ मुंह करके भी की जाती है। इस प्रकार सभी दिशाओं के स्वामी अलग-अलग ग्रह होते हैं और उनका जीवन में अलग-अलग प्रभाव उनकी स्थिति के अनुसार मनुष्य के जीवन में पड़ता रहता है।


कैसे करें इन दोषों का निवारण 
वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तु देवता की संतुष्टि गणेश जी की आराधना के बिना अकल्पनीय है। गणपति जी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है।

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