कालिमा से लालिमा की अोर जाने का पर्व...

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Sunday, October 30, 2016-1:59 PM

भारतीय संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों एवं तिथियों को इस तरह से पिरोया गया है कि हर दिन एक उत्सव की तरह हो और दैनिक जीवन में प्रसन्नता, सुख-समृद्धि व्याप्त रहे। हर दिन को धर्म, ज्योतिष, नियमों, संस्कारों से ऐसे जोड़ दिया गया है कि विद्वान हो या अशिक्षित, त्यौहारों का महत्व समझ आ जाए और सामर्थ्यानुसार उसे मना भी ले। बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक पर्व दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दीपावली का आगमन होता है। शरद के आगमन पर खरीफ की फसल किसान के घर आ जाती है और नए अन्न का भोग लक्ष्मी जी को लगा कर दीपमाला की जाती है। समय के साथ-साथ दीपावली के साथ अनेकों अन्य प्रसंग, तथ्य और घटनाएं जुड़ती चली गईं और दीपावली का स्वरूप बदलता चला गया।

 

दीपावली हमारे देश का प्रमुख पर्व है जो हर कोने में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इसका हर वर्ग, हर धर्म, जाति व समुदाय से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव है। एक दीए से दूसरा दीया जलाया जाता है और ‘जोत से जोत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो’  की भावना प्रसारित होती है। दीपावली कालिमा से लालिमा की आेर जाने का अवसर है। 

 

व्यापारी नए बही खाते आरंभ करते हैं। वृद्धि, सुख-समृद्धि के लिए अपने प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी पूजन करवाते हैं। भगवान राम जब अयोध्या लौटे तो अमावस का अंधकार था। उनका मार्ग प्रकाशमय करने के उद्देश्य से हर गुजरने वाला मार्ग आलोकित किया गया था और खुशी प्रकट करने के लिए दीपोत्सव किया गया। तभी से दीपों की आवली (माला) सजाने की प्रथा आरंभ हो गई।  

 

दीपों की इस पंक्ति को दीपावली कहा गया जो बाद में दीवाली बन गया। फिर हर वर्ष कार्तिक की अमावस्या पर प्रभु श्री राम का आगमन मनाया जाने लगा और यह उत्सव बन गया दीपावली और पूरा देश प्रकाशमय होने लगा। भगवान राम की अयोध्या वापसी पर की गई दीपमाला आज भी बदले हुए संदर्भ में आधुनिक तौर-तरीकों से की जाती है और यह त्यौहार भारत में सबसे बड़ा पर्व बन गया है जिसमें लगभग सभी समुदायों के लोग भाग लेते हैं। धर्म, समाज और इतिहास के साथ राम का नाम इस दीपावली से जुड़ा है तो राम राज्य की एक कल्पना का साकार होना भी हर भारतीय का सपना रहा है। 

 

भगवान राम और राम राज्य का उद्भव 10 हजार वर्ष पहले हुआ था। विश्व में यह अकेला उदाहरण है कि हम इतने सालों बाद भी ऐसे राजा को उसकी नीतियों और आदर्शों के लिए याद कर रहे हैं जिसके राज्य में शांति, सुख-समद्धि के अलावा हर छोटे-बड़े नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त थे। अन्य किसी देश में ऐसा सम्राट आज तक नहीं हुआ जिसका अनुकरण इतने वर्षों बाद भी किया जा सके और उस काल के वातावरण की कल्पना आज के आधुनिक युग में भी की जाए।

 

रामायण के ऐतिहासिक तथ्य अत्यंत स्पष्ट हैं जिससे पता चलता है कि राम युग में सुख, शांति, समृद्धि तथा सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक समानता का वर्चस्व रहा है। समाज में एकता थी, कोई विघटन नहीं था और न ही किसी अन्य राजा की अयोध्या हथियाने की कुदृष्टि ही थी जिसके कारण युद्ध की आशंका नगण्य थी और अमन चैन रहा। लोकतंत्र की नींव राम राज्य में ही रखी गई। आज के युग में हम राम राज्य की बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि रामायण काल में तभी युद्ध हुआ जब आम नागरिक राक्षसों से पीड़ित था। शांति तथा धर्म की रक्षा के लिए ही युद्ध किया गया, किसी की जमीन हथियाने के लिए नहीं। हमारे समाज में श्री राम का नाम सत्यता को प्रमाणित करने की एक मुहर बन गया है और इसी लिए सच्चाई सिद्ध करने के लिए राम की कसम खाई जाती है।


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