झूठ बोलने से बेहतर है अपराध स्वीकारना, इसी राह पर चलकर ये बने देश के पहले राष्ट्रपति

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Tuesday, June 20, 2017-3:07 PM

एक छोटे से बालक को नित नए खेल में बड़ा आनंद आता। एक दिन उसके पिता ने उसे एक छोटी सी कुल्हाड़ी लाकर दी। बालक नया खिलौना पाकर खुशी से झूम उठा। अब वह दिन-रात कुल्हाड़ी से ही खेलता। एक दिन खेल-खेल में उसने कुल्हाड़ी से आम का एक पेड़ काट डाला। उस समय बालक के पिता बाहर गए हुए थे। शाम को जब पिता घर आए और उन्होंने आम के पेड़ को कटा देखा तो आग बबूला हो गए। उन्होंने बालक से पूछा, ‘यह आम का पेड़ किसने काटा है।’ 

बालक सोचने लगा कि यदि वह सच बोलता है तो सजा अवश्य मिलेगी लेकिन झूठ बोलने से बचा जा सकता है। फिर बालक के मन ने कहा कि झूठ बोलने से सजा तो नहीं होगी किंतु झूठ बोलना भी गलत ही है। एक गलती छिपाने के लिए दूसरी गलती करना अपराध ही है। यह सोचकर बालक बोला, ‘मैंने इस पेड़ को काटा है।’

बालक की बात सुनकर पिता के चेहरे पर प्रसन्नता झलक उठी। वह यह जान चुके थे कि पेड़ उनके पुत्र ने ही काटा है किंतु उन्होंने पुत्र की ईमानदारी परखने के लिए ही उससे यह बात पूछी थी। 

इसके बाद वह बोले, ‘बेटा तुमने सच बोलकर मेरा मन जीत लिया है। मुझे लग रहा था कि तुम कहोगे कि पेड़ मैंने नहीं काटा है। किंतु तुमने मेरी आशा के विपरीत सच को स्वीकार किया। आज जो तुमने नुक्सान किया है, मैं तुम्हें उसके लिए सजा नहीं दूंगा। किंतु यह जरूर कहूंगा कि चाहे कुछ भी हो जाए जीवन में कभी भी झूठ न बोलना।’

बालक ने प्रण किया कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा। यही बालक आगे चलकर सच्चाई व मेहनत के बल पर देश के राष्ट्रपति पद पर विराजमान हुए। वह राष्ट्रपति थे डा. राजेन्द्र प्रसाद।
 


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