एक कमरे में थे युधिष्ठिर-द्रौपदी, तभी आ गए अर्जुन और...

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Wednesday, December 13, 2017-9:33 AM

पांचों पांडवों की एक ही पत्नी थी द्रौपदी। महर्षि व्यास की आज्ञा से पांचों भाइयों के बीच नियम बनाया गया था कि जब एक भाई द्रौपदी के साथ होगा तब दूसरा वहां नहीं जाएगा। एक बार की बात है। युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ कक्ष में विश्राम कर रहे थे। बाहर बैठे अर्जुन को एक ब्राह्मण की करुण पुकार सुनाई दी। कुछ लुटेरे उस ब्राह्मण का गौधन लूटकर भाग रहे थे। ब्राह्मण ने अर्जुन से सहायता मांगी। अर्जुन असमंजस में पड़ गए। वह सोचने लगे कि ब्राह्मण की किस प्रकार मदद की जाए? दुविधा यह थी कि उनका गांडीव उसी कक्ष में रखा था जहां युधिष्ठिर और द्रौपदी विश्राम कर रहे थे। लुटेरे हर पल दृष्टि से दूर होते जा रहे थे। अर्जुन ने अंतत: नियम के विपरीत उस कक्ष का द्वार धीरे से सरकाया, जहां युधिष्ठिर और द्रौपदी बैठे थे। वह कक्ष में रखे अपने धनुष-बाण लेकर निकल आए। लुटेरों का पीछा करके वह ब्राह्मण का गौधन उनसे छीन लाए और ब्राह्मण को वापस लौटाया। इसके बाद अर्जुन फिर युधिष्ठिर के पास पहुंचे और नियम भंग करने की सूचना देते हुए पूर्व निर्धारित दंड स्वरूप अपने लिए 12 वर्ष के राज्य निर्वासन की अनुमति मांगी। युधिष्ठिर अत्यंत व्यथित हो उठे।


उन्होंने अर्जुन से कहा, ‘‘हे अर्जुन! माना कि तुमने नियम तोड़ा है लेकिन अपने स्वार्थ के लिए नहीं, अपितु परोपकार के लिए ऐसा किया। ब्राह्मण के गौधन की रक्षा कर तुमने मुझे प्रजा से मिलने वाले अपयश से बचाया है। यदि परोपकार के लिए नियम शिथिल करना पड़े तो भी अपराध नहीं है बल्कि श्रेष्ठ कार्य है। तुम दंड के नहीं, यश के पात्र हो। अत: परोपकार के लिए या किसी की रक्षा के लिए और अच्छे कार्य के लिए कभी भी नियम को भंग करना पड़ जाए तो ऐसा अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह अपराध नहीं माना जाता।’’

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