सर्वप्रथम ज्योर्तिलिंग सोमनाथ, भगवान शिव यहां साक्षात विराजमान हैं

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Friday, August 11, 2017-8:16 AM

गुजरात के सौराष्ट्र में भगवान सोमनाथ का ऐतिहासिक मंदिर है। भारत भूमि पर भगवान शंकर के 12 ज्योर्तिलिंग स्थापित हैं, उनमें सोमनाथ को सर्वप्रथम ज्योर्तिलिंग के रूप में जाना जाता है। कहते हैं इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। यह मंदिर प्रभास क्षेत्र में स्थित है। कहते हैं भगवान शंकर के वर से चन्द्र की नष्ट हुई प्रभा पुन: प्राप्त हुई, इसीलिए इस क्षेत्र का नाम प्रभास पड़ा। यह मंदिर अत्यंत भव्य और वैभवशाली है। इतिहासकार बताते हैं कि पहली बार महमूद गजनी ने इसे लूटा। इसके बाद यह कई बार टूटा फिर इसका जीर्णोद्धार हुआ। सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयत्न से मौजूदा मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।


1951 में राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों नए मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी। सोमनाथ मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मंदिर प्रांगण में शाम 7.30 बजे से 8.30 बजे तक लाइट एंड साऊंड शो में मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है। मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे स्तम्भ है, उसके ऊपर तीर से दर्शाया गया है कि सोमनाथ मंदिर और पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव के मध्य कोई भू-भाग नहीं है।


शाप का निवारण : मंदिर के संबंध में किंवदंती है कि सोम अर्थात चन्द्र ने राजा दक्ष प्रजापति की 27 कन्याआें से विवाह किया था। रोहिणी नाम की पत्नी से उनका विशेष अनुराग था। शेष 26 पत्नियों के साथ उनका वियोग रहता था। 


इन 26 बहनों ने मिलकर पिता से शिकायत की। दक्ष प्रजापति ने कई बार चन्द्र को समझाया परंतु उन पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में राजा दक्ष ने चन्द्र को शाप दे दिया कि अब से हर दिन तुम्हारा तेज क्षीण होता जाएगा। चन्द्र का तेज कम होने लगा। पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्र और इंद्र सहित सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। 


ब्रह्मा जी ने चन्द्र को प्रभास क्षेत्र में विधिपूर्वक मृत्युंजय मंत्र का जप, तप और शिव आराधना करने की सलाह दी। चंद्रदेव ने वैसा ही किया। भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर शाप का निवारण किया, साथ ही यह भी कहा कि एक पक्ष में तुम्हारा तेज क्षीण होगा तो दूसरे पक्ष में बढ़ेगा। पूर्णिमा के दिन पूर्ण तेज होगा। 


चंद्र ने भगवान शिव का वहीं स्थापन कर सोमनाथ नाम दिया। मंदिर इतना भव्य है कि ऐसा लगता है भगवान शिव यहां साक्षात विराजमान हैं। 


श्राद्ध भी होता है यहां    

‘प्रभास’ में पूर्वजों का श्राद्ध भी होता है, जो किसी महीने में हो सकता है। चैत्र, भाद्रपद और कार्तिक महीने में श्राद्ध करना श्रेयस्कर होता है। समुद्र तट पर होने के कारण यहां गर्मी में शीतलता रहती है।


सोमनाथ मंदिर से 6 किलोमीटर की दूरी पर भालुका तीर्थ है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण यहां विश्राम कर रहे थे, तभी एक शिकारी ने उनके पैर के तलवे में पद्मचिन्ह को हिरण की आंख समझ कर धोखे से तीर मारा, तभी भगवान श्री कृष्ण ने देह त्याग कर वैकुंठ गमन किया। 


यहां तीन नदियों- हिरण, कपिला और सरस्वती का संगम भी है। इसके अतिरिक्त वाणेश्वर, भालुकातीर्थ, द्वारकानाथ मन्दिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज गुफा, गीता मंदिर आदि प्रमुख धार्मिक स्थल हैं।


यहां से 200 कि.मी. की दूरी पर द्वारका धाम है। यहां से 69 कि.मी. की दूरी पर 1424 कि.मी. में फैला गिर वन्यजीव अभ्यारण्य है और शेरों के लिए मशहूर है। पर्यटक गार्ड के साथ खुली जीप में बैठकर शेरों को करीब से देखने की लालसा में जाते हैं। 


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