माघी मुक्तसर पर विशेष चालीस मुक्ते: देश-विदेश से आती है संगत

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Saturday, January 13, 2018-1:30 PM

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी पांच प्यारों का आदेश मानकर चमकौर साहिब से सुरक्षित निकल आए थे। वहां से माछीवाड़ा, आलमगीर, दीना कांगड़ आदि क्षेत्रों से होते हुए कोटकपूरा तक पहुंच गए। यहां पर माझा क्षेत्र से संबंधित कुछ सिंहों ने भाई महां सिंह जी के नेतृत्व में गुरु जी को बेदावा दे दिया और गुरु जी से संबंध विच्छेद करके वहां से चले गए। जब वे मझैल सिंह अपने घर पहुंचे तो उनका स्वागत उनकी स्त्रियों ने लानतों के साथ किया। उनकी स्त्रियों ने भी यहां तक लानतें डालीं कि, आप हमारी चूडिय़ां पहन लो और घरों में बैठ कर काम करो। हम गुरु जी की मदद के लिए युद्ध करने जाएंगी। 


माई भागो जी ने इन्हें सबसे ज्यादा लानतें दीं। माई भागो ने उन सबको इकट्ठा किया और कहा कि, अभी भी समय है कि वह अपनी गलती को सुधार सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसी समय गुरु जी के पास जाकर माफी मांगो और उनकी युद्ध में मदद करो। माई भागो के नेतृत्व में सभी सिंह खिदराने की ढाब के नजदीक पहुंच गए तथा वहीं से मुगल फौज के साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने दुश्मन को गुरु जी तक पहुंचने नहीं दिया और घोर युद्ध करते हुए गुरु जी के लिए शहीद हो गए। उधर गुरु जी उस समय टिब्बी साहिब वाली जगह पर थे तथा वहीं से दुश्मन पर तीरों की वर्षा करते रहे।


दुश्मन फौज को लगने लगा कि उनके सामने जो लोग लड़ रहे हैं उनकी मदद तो कोई अनदेखी शक्ति कर रही है क्योंकि ऊपर से भी तीर आते थे और सामने से भी। काफी समय से लड़ते होने के कारण उन्हें जोरदार प्यास लगी हुई थी। परन्तु पानी पर तो गुरु जी का कब्जा था। इसलिए मुगल सेना हार मान कर पीछे को भाग गई परन्तु ये चालीस मझैल सिंह शहीद हो गए थे परन्तु इनका जत्थेदार भाई महां सिंह गंभीर रूप में जख्मी था।


गुरु जी ने उसका सिर अपनी गोद में रखा और अपने पल्लू के साथ उसका मुंह साफ किया, उसे पानी पिलाया। गुरु जी उस पर बहुत प्रसन्न हुए तथा कहा कि मांगो क्या मांगते हो? भाई महां सिंह ने कहा कि मेरी अंतिम इच्छा कि हमारा बेदावा फाड़ दो और हमें फिर सिखी में शामिल कर लो ताकि मेरे प्राण आसानी से निकल जाएं और मेरे अन्य साथियों की आत्मा को भी शांति मिले। गुरु जी ने महां सिंह और उसके साथियों का लिखा बेदावा फाड़ दिया और कहा कि तुम मेरे प्यारे सिख हो।


गुरु जी ने इन सभी शहीद हुए सिंहों का अपने हाथों अंतिम संस्कार किया। उनकी बहादुरी पर खुश होकर गुरु जी किसी को पांच हजारी, किसी को सात हजारी और किसी को दस हजारी सिंह का खिताब दिया। गुरु जी ने इस खिदराने की ढाब को मुक्तसर साहिब का नाम दिया। हर साल 1 माघ को यहां शहीदों की याद में बड़ा भारी शहीदी जोड़ मेल होता है। संगत देश-विदेश से यहां शहीदों को श्रद्धा के फूल भेंट करने के लिए पहुंचती हैं। 


इन 40 मुक्तों के नाम इस प्रकार हैं : भाई महां सिंह, भाई साधु सिंह, भाई सरजा सिंह, भाई सुहैल सिंह, भाई सुल्तान सिंह, भाई सोभा सिंह, भाई संत सिंह, भाई हरसा सिंह, भाई हरी सिंह, भाई कर्ण सिंह, भाई कर्म सिंह, भाई काला सिंह, भाई कीरत सिंह, भाई किरपाल सिंह, भाई खुशहाल सिंह, भाई गुलाब सिंह, भाई गंगा सिंह, भाई गंडा सिंह, भाई घरबारा सिंह, भाई च बा सिंह, भाई जादो सिंह, भाई जोगा सिंह, भाई जंग सिंह, भाई दयाल सिंह, भाई दरबारा सिंह, भाई दिलबाग सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई धन्ना सिंह, भाई निहाल सिंह, भाई निधान सिंह, भाई भाग सिंह, भाई बूड़ सिंह, भाई भोला सिंह, भाई भंगा सिंह, भाई शमीर सिंह, भाई मज्जा सिंह, भाई मान सिंह, भाई सैया सिंह, भाई राए सिंह, भाई लछमण सिंह।

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