महाभारत ग्रंथ है उपदेश रत्नों की खान

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Friday, November 10, 2017-10:20 AM

महाभारत का भारतीय वाङ्मय में बहुत ऊंचा स्थान है। इसे पंचम वेद भी कहते हैं। इसका विद्वानों में वेदों सा आदर है। इसमें अर्थ, कर्म, काम और मोक्ष चारों ही पुरुषार्थों का निरुपण किया गया है। धर्म के तो प्राय: सभी अंगों का इसमें वर्णन है। वर्णाश्रमधर्म, राजधर्म, दानधर्म, श्राद्ध धर्म, स्त्रीधर्म, मोक्ष धर्म आदि विविध धर्मों का शांतिपर्व एवं अनुशासन पर्व में भीष्म जी के द्वारा बहुत विशद वर्णन किया गया है। भगवद्गीता जैसा अनुपम ग्रंथ, जिसे सारा संसार आदर की दृष्टि से देखता है और जिसे हम विश्वसाहित्य का सर्वोत्तम ग्रंथ कहें तो भी कोई अत्युक्ति न होगी, इस महाभारत के भीष्मपर्व में है। ज्ञान, कर्म और भक्ति का एक ही स्थान पर जैसा सुंदर विवेदन गीता में है, वैसा अन्यत्र शायद ही कहीं मिलेगा। भगवद्गीता स्वयं भगवान की दिव्य वाणी जो ठहरी।


अठारहों पुराण, सारे धर्मशास्त्र तथा व्याकरण, ज्योतिष, दंदशास्त्र, शिक्षा, कल्प एवं निरुक्त इन छहों अंगों सहित चारों वेद ये सब मिलाकर एक ओर, और अकेला महाभारत एक ओर अर्थात वेद वेदांग, पुराण एवं धर्मशास्त्रों के अध्ययन से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह अकेले महाभारत के अध्ययन से प्राप्त हो सकता है।


जिस प्रकार समुद्र और हिमालय पर्वत दोनों को ही रत्नों का आगार कहा गया है, उसी प्रकार यह महाभारत ग्रंथ भी उपदेश रत्नों की खान कहा जाता है। एकाग्र मन से जो इस महाभारत इतिहास का पाठ करता है, वह मोक्षरूपी परम सिद्धि पाता है। इसमें कोई संदेह नहीं जो मनुष्य वेदज्ञ और अनेक शास्त्रों के जानने वाले ब्राह्मणों को सोने से मढ़े हुए सींगों वाली सौ गऊएं दान करता है, उसको एवं जो सदा सर्वदा महाभारत की पुण्यमयी कथा का श्रवण करता है, उसको समान ही फल मिलता है।


जिस महाभारत की स्वयं वेदव्यास जी ने ऐसी महिमा गाई है उसका संसार में मनोयोगपूर्वक जितना भी पठन-पाठन होगा, उतना ही जगत का कल्याण होगा।
महाभारत के पढने-सुनने का अधिकार मनुष्य मात्र को है। कोई किसी भी समुदाय अथवा जाति का क्यों न हो, वह महाभारत का अध्ययन कर उसमें दिए हुए उत्तमोत्तम उपदेशों को यथाधिकार आचरण में आकर अपना कल्याण कर सकता है। महाभारत की रचना करने में वेदव्यास जी का प्रधान उद्देश्य यही था कि जिन्हें शास्त्र, वेद पढने की आज्ञा नहीं देते, वेदों के महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित न रह जाए। इसी अभिप्राय से महाभारत के माहात्म्य के शलकों में यह बात कहीं गई है कि अकेले महाभारत को पढ़ लेने से ही वेद, वेदांग, पुराण एवं धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो सकता है। इसमें वेदों को नीचा बतलाना ग्रंथकार का अभीष्ट नहीं है। वस्तुत: महाभारत में जो कुछ कहा गया है, उसका आधार तो हमारे सर्व-मान्य वेद और स्मृतियां ही हैं। वेदों और स्मृतियों का ही तात्पर्य सरल एवं रोचक ढंग से महाभारत में वर्णित है।


महाभारत एक उच्चकोटि का काव्य तो है ही, सच्चा इतिहास भी है। यह कपोलकल्पित नहीं है। जिन महर्षि वेदव्यास की दी हुई दिव्य दृष्टि को पाकर संजय हस्तिनापुर में बैठे हुए ही कुरुक्षेत्र में होने वाले युद्ध की छोटी से छोटी घटनाएं ही नहीं अपितु भगवान का तत्व, प्रभाव एवं रहस्य तथा दूसरों के मन की बात तक जानने में समर्थ हो सके, उन्हीं महर्षि की वाणी में प्रमाद, असत्य एवं अतिश्योक्ति आदि की कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। वह त्रिकालज्ञ तथा सर्वथा राग द्वेष शून्य हैं। महाभारत के कलेवर के संबंध में भी लोग अनेक प्रकार की कल्पनाएं किया करते हैं परंतु इस विषय में मूलग्रंथ को ही हमें प्रमाण मानना चाहिए। महाभारत में ही इसकी शलकों की संख्या एक लाख बतलाई गई है।

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