अपनी राक्षसी प्रवृत्तियों पर विजय पाएं

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Monday, November 14, 2016-3:20 PM

इहलोक में मनुष्य अहंकारवश पापकर्म या अनैतिक कर्म कर जाता है, जिसका फल उसे जन्म-जन्मांतर तक भोगना पड़ता है। अहंकार एक राक्षसी प्रवृत्ति है और इस प्रवृत्ति के कारण अन्य दुर्गुण भी एकत्र होकर मनुष्य को पूर्ण राक्षस बना देते हैं। शास्त्रों में राक्षसों का वर्णन हर युग यानी सत्युग, त्रेता और द्वापर में हुआ है। 


इस युग में राक्षसी प्रवृत्तियों को पहचानने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्री रामचरित मानस में कहा है कि राक्षस लोग उनका हित करने वालों के प्रति भी मौका मिलने पर प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि इनकी दृष्टि में लाभ है। राक्षसी प्रवृत्ति वाले लोगों को दूसरों के उजडऩे में हर्ष और बसने में कष्ट होता है। ये दूसरों के दोषों को हजार आंखों से देखते हैं और दूसरों के हित रूपी घृत में मक्खी के समान कूद जाते हैं। अहंकार के कारण ये ईश्वर के विधान पर विश्वास न करके खुद को स्वयंभू समझकर अपने निर्णयों को सर्वोपरि मानकर दूसरों पर थोपने का प्रयास करते हैं। राक्षसी प्रवृत्ति के कारण इनके आस-पास का माहौल बोझिल और नकारात्मक हो जाता है। यही कारण है कि संकेतात्मक रूप में पृथ्वी ने भगवान से प्रार्थना रूप में कहा भी है कि मुझे पहाड़ों, वृक्षों और किसी भी वस्तु का इतना भार महसूस नहीं होता, जितना एक राक्षस का। कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य को आने वाले जन्मों में अपनी राक्षसी प्रवृत्ति का फल भोगना ही पड़ता है।


अक्सर राक्षसी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपने दुर्गुण मानने के लिए तैयार होता ही नहीं है इसीलिए मनुष्य को स्वाध्याय के जरिए अपने अंदर झांकने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय बिल्कुल निष्पक्ष रूप में करना चाहिए। ताकि व्यक्तित्व का असली स्वरूप पता लग सके। यदि राक्षसी प्रवृत्ति के दुर्गुण किसी व्यक्ति में हैं तो उसे उन पर धीरे-धीरे विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।


 

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