आज लगाई गई डुबकी, भाई-बहन को देगी यम फांस से मुक्ति

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You Are HereDharmik Sthal
Saturday, October 21, 2017-9:30 AM

कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज का पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। दीवाली के त्यौहार के साथ केवल दीपमालाएं ही नहीं बल्कि अनेकों उत्सवों की मालाएं भी गुंथी हुई हैं। त्रयोदशी से लेकर कार्तिक द्वितीय तक के पांच दिन अपनी परम्पराओं के साथ प्रतिवर्ष हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं। इन्हीं में से एक है- भ्रातृ द्वितीया यानि भाईदूज जो दीवाली से तीसरे दिन मनाया जाता है। पूरे भारत में मनाए जाने वाले इस पर्व को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। जैसे बंगाल में भाईफोटा, महाराष्ट्र में भाऊ बीज, गुजरात में भाई बीज और पंजाब में टिक्का आदि। 
                                                                       

भाई दूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। भाई दूज पर्व भाईयों के प्रति बहनों के श्रद्धा व विश्वास का पर्व है। इस पर्व को बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक लगा कर मनाती हैं और भगवान से अपने भाइय़ों की लम्बी आयु की कामना करती हैं। दीपोत्सव का समापन दिवस है कार्तिक शुक्ल द्वितीय। जिसे भैयादूज कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन जो यम देव की उपासना करता है, उसे असमय मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन बहन अपने भाई के तिलक लगाकर स्नेह-प्रेम की अभिव्यक्ति करती हैं। 


इस दिन यमराज ने अपनी बहन के घर आतिथ्य स्वीकार किया था और भोजन ग्रहण किया था, इसलिए युगों से इस परम्परा का भाई आज भी निर्वाह करते आ रहे हैं। कहते हैं भाई दूज पर भाई बहन की साथ-साथ लगाई गई यमुना में डुबकी यम फांस से देती है मुक्ति। मान्यता है की आज भी यमराज अपनी यमपुरी से बहन यमुना के घर तिलक लगवाने आते हैं। नि:स्वार्थ भावना के द्वारा ही भाई-बहन के संबंधों को सुदृढ़ बनाया जा सकता है। इस दिन बहन के यहां भोजन करने और द्रव्य देने की प्रथा है जो शुभ समझा जाता है। दूर-दूर से भाई-बहन यमुना स्नान करने मथुरा आते हैं और पुण्य के भागी होते हैं। मान्यता है कि यमुना के तट पर भाई अपनी बहन के हाथ का बनाया भोजन ग्रहण करे तो इसके लिए आयुवर्धक होता है। व्यवसायी लोग इस दिन कलम दवात की पूजा भी करते हैं।

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