सावधान! दान देने से पहले रखें ध्यान, भुगतना पड़ सकता है घातक परिणाम

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Thursday, November 17, 2016-8:45 AM

श्रीकृष्ण के स्पर्श से गिरगिट बने नृग को मिली मुक्ति
एक बार साम्ब, प्रद्युम्न, चारुमान और गद आदि यदुवंशी राजकुमार नगर से दूर एक उपवन में घूमने के लिए गए। बहुत देर तक घूमने के बाद उन्हें प्यास लग आई और वे प्यास बुझाने के लिए किसी कुएं या सरोवर की तलाश करने लगे। कुछ देर के बाद उन्हें एक कुआं नजर आया। राजकुमारों ने कुएं में झांका तो उसमें पानी तो नहीं था परंतु उसके अंदर जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर वे आश्चर्य में पड़ गए। एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएं में उल्टा लटका हुआ था।


राजकुमारों ने उस गिरगिट को बाहर निकालना चाहा लेकिन वे उसे निकाल न सके। तब वे वापस नगर में लौट आए और श्रीकृष्ण के पास जाकर उन्हें यह बात बताई। सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘राजकुमारो! तुम मुझे उसे कुएं के पास ले चलो। मैं उस गिरगिट को कुएं से बाहर निकाल दूंगा।’’


राजकुमार श्रीकृष्ण को उस कुएं के पास ले गए और संकेत से बताया कि इस कुएं में उल्टा लटका हुआ है वह गिरगिट। श्रीकृष्ण ने भी कुएं में झांका तो उन्हें राजकुमारों की बात सच लगी। उन्होंने भी उस विशालकाय गिरगिट को देखा जो कुएं में उल्टा लटका हुआ था। श्रीकृष्ण ने एक रस्सी की सहायता से उस गिरगिट को कुएं से बाहर निकाला और हाथ से पकड़ कर उसे कुएं की जगत (मुंडेर) पर रख दिया।


तभी एक चमत्कार हुआ। श्रीकृष्ण के हाथ का जैसे ही गिरगिट के शरीर से स्पर्श हुआ, गिरगिट का शरीर वहां से अदृश्य हो गया और उसके स्थान पर एक दिव्य आकृति का पुरुष प्रकट हो गया। उस पुरुष ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीकृष्ण ने उससे पूछा, ‘‘हे महाभाग! तुम्हारा रूप तो अति सुंदर है। तुम कौन हो? मैं तो यही समझा हूं कि तुम कोई श्रेष्ठ देवता हो। तुम मुझे अपने बारे में बताओ, किस कारणवश तुम्हें इस गिरगिट की योनि में आना पड़ा?’’


तब उस दिव्य आकृति वाले पुरुष ने कृष्ण से निवेदन किया, ‘‘प्रभो! मेरा नाम नृग है। मैं महान प्रतापी राजा इक्ष्वाकु का पुत्र हूं। जब कभी भी संसार के दानी पुरुषों की गिनती होगी, उनमें मेरा नाम अवश्य गिना जाएगा।’’


हे देव! मैंने अपने शासनकाल में असंख्य गायों का दान किया था। वे सारी गाएं सीधी और दुधारू थीं। उन सबके साथ बछड़े थे और उन बछड़ों के सींगों में सोना तथा उनके खुरों में चांदी मढ़ी हुई थी।’’


‘‘फिर तो आप बहुत पुण्यवान पुरुष हुए। ऐसे पुरुष का स्थान तो स्वर्गलोक में होता है, फिर ऐसा क्या कारण बन गया, जो तुम्हें इस योनि में भटकना पड़ा?’’ श्रीकृष्ण ने पूछा।


‘‘वही तो बता रहा हूं देव!’’


नृग बोला, ‘‘एक बार दुर्भाग्य से एक ऐसी घटना घटित हो गई जिसके अभिशाप के कारण मुझे इस गिरगिट की योनि में भटकना पड़ा। हुआ यह कि अपनी दिनचर्या के अनुसार एक बार मैंने एक ब्राह्मण को कुछ गाएं दान में दे दीं। उन गायों में कुछ गाएं ऐसी थीं, जिन्हें ये पहले एक अन्य ब्राह्मण को दान कर चुका था। वे गाएं किसी प्रकार उस ब्राह्मण से छूट कर दूसरे ब्राह्मण को दान की गई गायों में आ मिलीं। जब वह ब्राह्मण उन गायों को लेकर जा रहा था, तभी वह पहले वाला ब्राह्मण भी वहां आ पहुंचा और उसने मेरे द्वारा दी गई अपनी गायों को पहचान लिया। वह उस ब्राह्मण से बोला कि ये गाएं तो मेरी हैं, राजा ने मुझे दान में दी थीं। इस पर दूसरा ब्राह्मण कहने लगा कि अब तो ये गाएं मेरी हैं। राजा इन्हें मेरे निमित्त दान कर चुका है। इस बात पर दोनों में विवाद होने लगा। दोनों ब्राह्मण मेरे पास पहुंचे।


तब मैंने पहले ब्राह्मण से निवेदन किया, ‘‘ब्राह्मण देवता! मुझे मालूम नहीं था कि इन गायों को मैं पहले ही आपको दान कर चुका हूं। जानता होता तो कभी भी इन्हें दूसरे ब्राह्मण को दान में न देता। अब तुम ऐसा करो, मैं इन गायों के बदले तुम्हें इनसे भी ज्यादा गाएं दान में दिए देता हूं। कृप्या उन्हें स्वीकार करो और इस विवाद को समाप्त कर दो।’’


लेकिन पहले वाला ब्राह्मण ऐसा करने के लिए तैयार न हुआ। वह बोला, ‘‘राजन! मुझे तो सिर्फ अपनी ही गाएं चाहिएं। मुझे इनके बदले में दी गई दूसरी गाय स्वीकार्य नहीं है।’’


तब मैंने दूसरे ब्राह्मण से प्रार्थना की, ‘‘हे विप्रवर! तुम ये गाएं इन्हें दे दो, बदले में मैं तुम्हें इनसे दोगुनी गाएं दे देता हूं। साथ ही जितना धन तुम मांगोगे, उतना धन भी दे दूंगा।’’


लेकिन वह ब्राह्मण भी न माना और कहने लगा, ‘‘राजन! मुझे तो वही गाएं स्वीकार्य हैं, जिन्हें आपने मुझे दान में दिया है। इनके बदले यदि अब आप मुझे एक लाख स्वर्ण मुद्राएं और एक हजार गाएं भी देंगे, तब भी उन्हें मैं स्वीकार नहीं करूंगा।’’


हे देव! उस समय मेरी स्थिति बहुत हास्यास्पद बन गई थी। पहला ब्राह्मण वही गाएं लेने की जिद कर रहा था और दूसरा उन गायों को उसे न देने के लिए कृतसंकल्प था। अंत में दोनों ही दान की गई गायों को लिए बिना वहां से चले गए और मेरी दानशीलता पर कलंक लग गया। अपनी आयु पूरी होने पर जब मुझे धर्मराज के समक्ष उपस्थित किया गया तो उन्हें कहा, ‘‘राजन! तुमने पुण्य तो अनेक किए है, किंतु कुछ पाप भी तुमसे हुए हैं। बताओ पहले पाप का फल भोगोगे या पुण्यों का?’’


तब मैंने धर्मराज से कहा, ‘‘हे देव! अपने पुण्यों का फल तो मैं बाद में ही भोगूंगा, पहले मेरे पाप का फल मुझे भोगने दीजिए।’’


इस पर धर्मराज ने मुझे गिरगिट की योनि देकर इस अंधे कुएं में छोड़ दिया। बस तब से मैं इसी कुएं में रहता हुआ अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा था। अब आपके हाथ का स्पर्श हुआ है तो मेरे पापों का प्रायश्चित हो गया और मुझे पुन: यह शरीर मिल गया। हे प्रभु! अब मैं आपकी शरण में हूं।


भगवान श्रीकृष्ण ने तब राजा नृग को स्वर्ग में स्थान दे दिया और इस प्रकार अपने पापों का प्रायश्चित कर राजा नृग सीधा स्वर्ग लोक को चला गया।


(श्रीमद्भागवत पुराण से)
 


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