श्रीमद्भगवद्गीता: संयम और सहनशील बन करें समय का सदुपयोग

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Tuesday, January 09, 2018-6:01 PM

शांत रहें, सहनशील बनें 

जीओ गीता के संग, 
सीखो जीने का ढंग 

सप्त श्लोकी गीता (बंदी भाइयों के लिए)

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।     —गीता 2/14


भावार्थ: संसार में सर्दी गर्मी, सुख-दुख के द्वंद्व आने-जाने वाले एवं अनित्य हैं। निराशा में नहीं डूबे रहो। उत्साह नहीं छोड़ो-विश्वास नहीं तोड़ो, सहनशील बनो। वे दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे।


संसार में सब कुछ आने-जाने वाला है, परिवर्तनशील है। न सर्दी सदा रहती है और न ही गर्मी। न सुख सदा रहता है न दुख। न अनुकूलताएं सदा रहती हैं न प्रतिकूलताएं। यह सत्य है कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी कारण से जेल में बंद होने पर निराशा होती ही है, धीरे-धीरे निराशा बढ़ती जाती है, कभी-कभी मन पूरी तरह टूटने सा लगता है।


यहां का निर्धारित समय पूरा होना ही है। निराशा में गिरे-घिरे रह कर समय बिताओ अथवा गीता जी के ऐसे श्लोक से अपने भावों को आशावादी बनाकर समय को तो अपनी गति से आगे बढऩा है।


आओ, यह सोच कर अच्छे उत्साहवादी विचारों, अच्छे कर्मों की ओर आगे बढ़ो-उत्साह नहीं छोड़ो, विश्वास नहीं तोड़ो वे दिन नहीं रहे, तो ये भी नहीं रहेंगे। संसार की स्थितियां-परिस्थितियां, धन वैभव से सब कुछ आने-जाने वाला है। न अनुकूलता सदा रहती है और न ही प्रतिकूलता! यह विचार जीवन में आने से प्रतिकूलता होने पर मन बहुत अधिक निराशावादी नहीं बनता तथा अनुकूलता की स्थिति में अहंकार नहीं करता। गीता जी के अनुसार मन की यह सम स्थिति योग है-समत्वं योग उच्यते (2/48)


संयम और सहनशील बनकर समय का सदुपयोग करें। विश्वास रखें-जेल की बंद दीवारों में भी जीवन को अच्छा बनाने का खुला रास्ता मिल सकता है। 

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