यह शिक्षा इस्लाम धर्म के ताज में एक दमकते हुए मोती के समान है

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Tuesday, June 13, 2017-12:23 PM

इस्लाम में पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार पर बड़ा बल दिया गया है परंतु इसका उद्देश्य यह नहीं है कि पड़ोसी की सहायता करने से पड़ोसी भी समय पर काम आए अपितु इसे एक मानवीय कर्तव्य ठहराया गया है, इसे आवश्यक करार दिया गया है और यह  कर्तव्य पड़ोसी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि किसी साधारण मनुष्य से भी असम्मानजनक व्यवहार न करने की ताकीद की गई है। पवित्र कुरआन में लिखा है, ‘‘और लोगों से बेरुखी न कर।’’     (कुरआन 31:18)


पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार का विशेष रूप से आदेश है। न केवल निकटतम पड़ोसी के साथ, बल्कि दूर वाले पड़ोसी के साथ भी अच्छा व्यवहार करने की ताकीद आई है। सुनिए ,‘‘और अच्छा व्यवहार करते रहो माता-पिता के साथ, संगे-संबंधियों के साथ, अबलाओं के साथ, दीन-दुखियों के साथ, निकटतम और दूर के पड़ोसियों के साथ भी।’’     (कुरआन, 4:36)


पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार के कई कारण हैं-एक विशेष बात यह है कि मनुष्य को हानि पहुंचने की आशंका भी उसी व्यक्ति से अधिक होती है जो निकट हो, इसलिए उसके संबंध को सुदृढ़ और अच्छा बनाना एक महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य है ताकि पड़ोसी सुख और प्रसन्नता का साधन हो, न कि दुख और कष्ट का कारण।


पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करने के संबंध में जो ईश्वरीय आदेश अभी प्रस्तुत किया गया है उसके महत्व को पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) ने विभिन्न ढंग से बताया है और आपने स्वयं भी उस पर अमल किया है।


एक दिन आप अपने मित्रों के बीच विराजमान थे। उनसे फरमाया, ‘‘खुदा की कसम, वह मोमिन नहीं! खुदा की कसम, वह मोमिन नहीं! खुदा की कसम, वह मोमिन नहीं!’’


आपने तीन बार इतना बल देकर कहा तो मित्रों ने पूछा, ‘‘कौन? ऐ अल्लाह के रसूल?’’


आपने फरमाया, ‘‘वह जिसका पड़ोसी उसकी शरारतों से सुरक्षित न हो।’’


एक और अवसर पर आपने फरमाया, ‘‘जो खुदा पर और प्रलय पर ईमान रखता है, उसको चाहिए कि वह अपने पड़ोसी की रक्षा करे।’’


एक और अवसर पर आपने फरमाया, ‘‘ईश्वर के निकट मित्रों में वह अच्छा है, जो अपने मित्रों के लिए अच्छा हो और पड़ोसियों में वह अच्छा है, जो अपने पड़ोसियों के लिए अच्छा हो।’’


एक बार आपने अपनी सुपत्नी हजरत आइशा (रजि.) को शिक्षा देते हुए फरमाया, ‘‘जिबरील (अलैहि.) ने मुझे अपने पड़ोसी के महत्वपूर्ण अधिकारों की इतनी ताकीद की कि मैं समझा कि कहीं विरासत में वे उसे भागीदार न बना दें।’’ 


इसका साफ अर्थ यह है कि पड़ोसी के अधिकार अपने निकटतम संबंधियों से कम नहीं। एक बार आपने एक साथी हजरत अबू जर (रजि.) को नसीहत देते हुए कहा, ‘‘अबू जर! जब शोरबा पकाओ तो पानी बढ़ा दो और इसके द्वारा अपने पड़ोसियों की सहायता करते रहो।’’


चूंकि स्त्रियों से पड़ोस का संबंध अधिक होता है, इसलिए आपने स्त्रियों को संबोधित करते हुए विशेष रूप से कहा, ‘‘ऐ मुसलमानों की औरतो। तुम में से कोई पड़ोसिन अपनी पड़ोसिन के उपहार को तुच्छ न समझे।’’


हजरत मोहम्मद (सल्ल.) ने पड़ोसियों की खोज खबर लेते रहने की बड़ी ताकीद की है और इस बात पर बहुत बल दिया है कि कोई मुसलमान अपने पड़ोसी के कष्ट और दुख से बेखबर न रहे। एक अवसर पर आपने फरमाया, ‘‘वह मोमिन नहीं जो खुद पेट भर खाकर सोए और उसकी बगल में उसका पड़ोसी भूखा रहे।’’


एक बार अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने फरमाया, ‘‘व्यभिचार निषिद्ध (हराम) है, ईश्वर ने इसे बहुत बुरा काम कहा है। किन्तु दस व्यभिचार से बढ़कर व्यभिचार यह है कि कोई अपने पड़ोसी की पत्नी से व्यभिचार करे। चोरी निषिद्ध है, अल्लाह और पैगम्बर ने उसे वर्जित ठहराया है किन्तु दस घरों में चोरी करने से बढ़कर यह है कि कोई अपने पड़ोसी के घर से कुछ चुरा ले।’’


दो मुसलमान स्त्रियों के संबंध में आपको बताया गया है कि पहली स्त्री धार्मिक नियमों का बहुत पालन करती है किन्तु अपने दुर्वचनों से पड़ोसियों की नाक में दम किए रहती है। दूसरी स्त्री साधारण रूप से रोजा-नमाज अदा करती है किन्तु अपने पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करती है। हजरत मोहम्मद (सल्ल.) ने फरमाया, ‘‘पहली स्त्री नरक में जाएगी और दूसरी स्वर्ग में।’’


अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने पड़ोसी के स्वत्व पर इतना बल दिया है कि शायद ही किसी और विषय पर दिया हो।


एक अवसर पर आपने फरमाया, ‘‘तुममें कोई मोमिन नहीं होगा जब तक अपने पड़ोसी के लिए भी वही पसंद न करे जो अपने लिए पसंद करता है।’’ अर्थात पड़ोसी से प्रेम न करे तो ईमान तक छिन जाने का खतरा रहता है।


यहीं पर बात खत्म नहीं होती, एक और स्थान पर आपने इस बारे में जो कुछ फरमाया वह इससे भी जबरदस्त है। आपने फरमाया, ‘‘जिसको यह प्रिय हो कि खुदा और उसका रसूल उससे प्रेम करे या जिसको खुदा और उसके रसूल के प्रेम का दावा हो तो उसको चाहिए कि वह अपने पड़ोसी के साथ प्रेम करे और उसका हक अदा करें।’’


अर्थात जो पड़ोसी से प्रेम नहीं करता उसका खुदा और रसूल से प्रेम का दावा भी झूठा है तथा खुदा और रसूल के प्रेम की आशा रखना एक भ्रम है। इसीलिए आपने फरमाया है कि कयामत के दिन ईश्वर के न्यायालय में सबसे पहले दो वादी उपस्थित होंगे जो पड़ोसी होंगे। उनसे एक-दूसरे के संबंध में पूछा जाएगा।


मनुष्य के सद्व्यवहार एवं दुर्व्यवहार की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि उसे वह व्यक्ति अच्छा कहे जो उसके बहुत करीब रहता हो। चुनांचे एक दिन आप (सल्ल.) के कुछ साथियों ने आपसे पूछा, ‘‘ऐ अल्लाह के रसूल। हम कैसे जानें कि हम अच्छा कर रहे हैं या बुरा।’’


आपने फरमाया, ‘‘जब अपने पड़ोसी से तुम अपने बारे में अच्छी बात सुनो तो समझ लो कि अच्छा कर रहे हो और जब बुरी बात सुनो तो समझो बुरा कर रहे हो।’’


पैगम्बरे इस्लाम ने इस विषय में हद तय कर दी है। यही नहीं कि पड़ोसी के विषय में ताकीद की है बल्कि यह भी कहा है कि अगर पड़ोसी दुर्व्यवहार करे तो जवाब में तुम भी दुर्व्यवहार न करो और यदि आवश्यक ही हो तो पड़ोस छोड़ कर कहीं अन्य स्थान पर चले जाओ। अत: एक बार आपके एक साथी ने आपसे शिकायत की कि ऐ अल्लाह के रसूल! मेरा पड़ोसी मुझे सताता है। आपने फरमाया, ‘‘जाओ, धैर्य से काम लो।’’


इसके बाद वह फिर आया और शिकायत की तो आपने फरमाया, ‘‘जाकर तुम अपने घर का सामान निकालकर सड़क पर डाल दो।’’


साथी ने ऐसा ही किया। आने-जाने वाले उनसे पूछते तो वह उनसे सारी बातें बयान कर देते। इस पर लोगों ने उनके पड़ोसी को आड़े हाथों लिया और उसे बड़ी लज्जा की अनुभूति हुई। इसलिए वह अपने पड़ोसी को मनाकर दोबारा घर में वापस लाया और वादा किया कि अब वह उसे न सताएगा।


अपने पड़ोसी से दुर्व्यवहार को जितनी बुराई अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने बयान फरमाई है और उसे जितना बड़ा पाप ठहराया है, किसी और धर्म में उसका उदाहरण नहीं मिलता। इसलिए सत्य यही है कि पड़ोसी के अधिकारों को इस प्रकार स्वीकार करने से इस्लाम की यह शान बहुत बुलंद नजर आती है। इस्लाम का दर्जा इस संबंध में बहुत ऊंचा है। यह शिक्षा इस्लाम धर्म के ताज में एक दमकते हुए मोती के समान है।


 

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