पांडव वंश के आखिरी राजा क्यों मिटाना चाहते थे सांपों का अस्तित्व

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Tuesday, November 28, 2017-1:59 PM

महाभारत एक महाकाव्य है। जिसमें कथाओं का विशाल संग्रह है। यह एक एेसा ग्रंथ हैं जिस से मनुष्य को उसके हर प्रश्न का उत्तर मिल सकता है। महाभारत की कथाएं पूरी दुनिया में प्रचलित है, न केवल हिंदुस्तानी बल्कि विदेशी लोग भी इससे बेहद प्रभावित हैं। इससे इसके इतिहास का बाखूबी पता लगता है। इसमें बताई गई कहानियों के अनेक चरित्र आज भी पूरी शिद्दत से संपूर्ण जनमानस पर अपनी छाप छोड़ते नजर आते हैं। उन्हीं पात्रों में से एक पांडव कुल के अंतिम सम्राट जनमेजय से जुडीं एक कथा है। जिन्हों ने एक बार पृथ्वी से सांपों का अस्तित्व मिटाने के लिए सर्प मेध यज्ञ किया। जिसमें पृथ्वी पर उपस्थित लगभग सभी सांप समाप्त हो गए। हालंकि अंत में अस्तिका मुनि के हस्तक्षेप के कारण सांपों का सम्पूर्ण विनाश होने से रह गया था, अन्यथा आज पृथ्वी पर सांपों का अस्तित्व नहीं होता।

आइए जानतें हैं कौन थे जनमेजय और क्यों उन्होंने सांपों के सम्पूर्ण विनाश की प्रतिज्ञा ली थी-

 

राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप
महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से समीप से गुजरे।

 

ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दे दिया कि तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी। राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

 

कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत
राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की, कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए और ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा पर तक न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपों का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राजा परीक्षित को डस लिया। राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर विराजे, जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे।

 

राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ
जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे, लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी।

 

कैसे खत्म हुआ सर्प मेध यज्ञ
सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए सभी देवता जनमेजय से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे लेकिन जनमेजय किसी भी रूप में अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था। जनमेजय के यज्ञ को रोकने के लिए अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिनके पिता एक ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या थी। अस्तिका मुनि की बात जनमेजय को माननी पड़ी और सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक को मुक्त करना पड़ा।

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