सरोवर में तैरते हैं पिंड, पितरों को मिलती है मुक्ति

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You Are HereDharmik Sthal
Saturday, September 24, 2016-9:02 AM

हमारे मृत पूर्वजों का तर्पण करवाना हिंदू धर्म की एक बहुत प्राचीन प्रथा है। हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन निर्धारित किए गए हैं। इन दिनों में अपने पूर्वजों की मुक्ति के श्राद्ध किया जाता है। हमारे देश में श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए कई तीर्थ हैं, लेकिन उनमें से कुछ तीर्थ ऐसे भी हैं जिनका अपना अलग ही महत्व है। इन तीर्थों पर पितृपक्ष में श्राद्ध व तर्पण करने से पितर संतुष्ट होते हैं अौर सुख-समृद्धि धन व ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। एक ऐसा ही तीर्थ गुजरात में है, जहां पिंडदान करने से मृतकों को मुक्ति मिलती है।

 

गुजरात में द्वारिका से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान स्थित है, जिसका प्राचीन नाम पिण्डारक या पिण्डतारक है। इस स्थान पर एक सरोवर है। लोग श्राद करने के पश्चात पिंड़ों को इस सरोवर में डालते हैं। कहा जाता है कि सरोवर में डाले गए पिंड पानी में डूबते नहीं बल्कि तैरते रहते हैं। यहां कपालमोचन महादेव, मोटेश्वर महादेव और ब्रह्माजी के मंदिर के साथ ही श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी है।

 

कहा जाता है कि यहां पर महर्षि दुर्वासा का आश्रम था। पांडव महाभारत युद्ध के पश्चात अपने मृत बांधवों का श्राद्ध करने सभी तीर्थों में गए थे। उस समय वे इस स्थान पर भी आए थे। पांडवों ने लोहे का एक पिंड बनाकर उसे जल में डाला तो वह पिंड भी जल पर तैर गया तब उन्हें विश्वास हो गया कि उनके बंधु-बांधवों को मुक्ति मिल गई है। कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा के वरदान से इस तीर्थ पर पिंड तैरते रहते हैं।

 

कैसे पहुंचे
यहां बसों अौर रेलगाड़ियों द्वारा पहुंचा जा सकता है। पिंडारा से करीब 15 कि.मी. दूर भोपालका नामक स्टेशन स्थित है। वहां से बसों अौर निजी वाहनों द्वारा पिंडारा पहुंच सकते हैं। 


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