भारतीय धार्मिक स्थलों का धुआं पिघला रहा है हिमालय के ग्लेशियर

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Wednesday, October 30, 2013-11:25 PM

लंदन: हिंदुओं के शवदाह, मुसलमानों के कब्रगाह और बौद्ध मठों से उठने वाले धुएं का भारतीय उपमहाद्वीप में ‘ग्लोबल वार्मिंग तथा हिमालई ग्लेशियरों के पिघलने’ के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले ग्रीनहाउस गैसों में एक चौथाई का योगदान है। एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।

अध्ययनकर्ताओं को लंबे समय से संदेह था कि भारत, नेपाल और दक्षिण एशिया में होने वाले धार्मिक संस्कार भूरे कार्बन के स्तर और ‘कालिख’ के लिए एक वजह हो सकते हैं जो क्षेत्र में वायु को प्रदूषित कर रहा है लेकिन समस्या को कम करने के लिए अभी तक थोड़ा काम ही किया गया है। टेलीग्राफ में छपी एक खबर के मुताबिक अमेरिकी प्रांत नेवादा के डेजर्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट और छत्तीसगढ़ के पंडित रवि शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक इसका प्रभाव काफी अधिक है।

2011 से 2012 के बीच अध्ययनकर्ताओं ने शादी समारोहों में जलाई जाने वाली आग, शवदाह, मंदिरों में और कब्रों पर जलाए जाने वाली अगरबत्तियों के उत्सर्जन को मापा। उन्होंने पाया कि आम की लकडिय़ां, गोबर के उपले, कर्पूर, पत्तियां और गोमूत्र को जलाया जाता है। अध्ययनकर्ताओं ने नेचर पत्रिका के बताया कि उन्होंने 14 घातक यौगिकों की पहचान की है जिनमें फार्मालडेहाइड, बेंजीन, स्टेरीन और बुटाडीन आदि शामिल हैं।

उन्होंने पाया कि शवदाह के धुएं काफी मात्रा में ‘भूरे कार्बन एयरोसोल’ गैस उत्सर्जित करते हैं जिसे ग्लोबल वार्मिंग के लिए दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता माना जाता है। यह सूरज की रोशनी को सोख लेता है और गर्मी पैदा करता है। इनके काले कण बर्फ और ग्लेशियर पर जमा हो जाते हैं और इससे वे गर्म होकर पिघलने लगते हैं। भारत में 30 लाख धार्मिक स्थल हैं और 2011 की जनगणना के मुताबिक इस देश में एक करोड़ से अधिक शादियां हर साल होती हैं।


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