पाकिस्‍तान में भगत सिंह की यादों को जिंदा रखने की कोशिश

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Tuesday, December 03, 2013-2:37 PM

इस्लामाबाद: भले ही पाक सरकार ने अपने यहां से स्वतंत्रता संग्राम के कई पन्ने गायब कर दिए हों, लेकिन पड़ोसी देश में आज भी कई लोग उन यादों को सहेज कर रखना चाहते हैं। सरदार भगत सिंह उन्हें आज भी याद हैं और वह लाहौर जैसे शहरों से भगत सिंह के रिश्‍ते को जिंदा रखने के लिए आज भी भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। पाकिस्तान में लेफ्ट विंग पार्टी और अवामी वर्कर्स पार्टी लाहौर में इन दिनों चलाए एक कैंपेन के तहत फवारा चौक के नाम को बदलकर भगत सिंह चौक किए जाने की मांग की है।

गौरतलब है कि यह फवारा चौक वही जगह है। जहां भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी। तब यह जगह लाहौर जिला जेल के अंदर हुआ करती थी। अब लाहौर जेल कैंप जेल हो चुका है और फांसी वाली जगह एक ट्रैफिक आइलंड बन गया है। भगत सिंह ने लाहौर में ही अपने कॉलेज के दिन गुजारे थे, जबकि उनका गांव लाहौर से कुछ घंटों की दूरी पर है।

मिल गई थी प्रस्ताव को मंजूरी लेकिन...
पिछले साल लेफ्ट पार्टी की मांग पर लाहौर सिटी गवर्मेंट ने दिलकशा लाहौर समिति बनाई थी, जिन्‍हें लाहौर से जुड़ी शख्सियतों के नाम पर उनसे जुड़ी जगहों के नाम रखने का प्रस्‍ताव तैयार करना था। तब समिति ने फवारा चौक को भगत सिंह का नाम देने का सुझाव दिया और लाहौर सिटी गवर्मेंट ने इसकी मंजूरी भी दे दी, लेकिन कट्टरपंथियों को यह प्रस्‍ताव रास नहीं आया।

वह गैरइस्लामिक नाम देने का मुद्दा उठाकर प्रस्‍ताव को अदालत भी गए, लेकिन अवामी वर्कर्स पार्टी और लाहौर स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अपनी लड़ाई जारी रखी। फिलहाल अदालत ने  नामकरण के मामले पर स्‍टे लगा रखी है।

इस साल 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के दिन पार्टी के नेता फारुक तारिक, महिला कार्यकर्ता सईदा दीप और कुछ लोग भगत सिंह की तस्‍वीर लेकर फवारा चौक शहीदों को श्रद्धाजलि देने पहुंचे, लेकिन हाफिज सईद की जमात उद दावा के कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया, लेकिन बाद में पुलिस की मौजूदगी में कार्यक्रम संपन्‍न हुआ।

बेकरी मालिक ने बढ़ा दिया 25 किलो केक
27 सितंबर 2013 को भी भगत सिंह के जन्मदिन पर ऐसा ही कार्यक्रम रखा गया। इस कार्यक्रम के लिए राहत बेकरी में इसके लिए 50 किलो केक का ऑर्डर दिया गया। बेकरी के मालिक चौधरी अक्रम को जब कार्यक्रम का पता चला तो उन्‍होंने कार्यक्रम के समर्थन में केक में 25 किलो अपनी तरफ से जोड़ दिए।

फारुक कहते हैं, ''ना तो अक्रम साहब पार्टी के कार्यकर्ता हैं और ना ही वह मुझे जानते हैं, लेकिन उनके समर्थन ने यह बता दिया कि  इस मसले पर एक आम पाकिस्‍तानी क्‍या सोचता है। 27 सितंबर को फवारा चौक पर 200 से ज्यादा लोग समर्थन देने पहुंचे और इस बार जमात उद दावा के समर्थक गायब थे। इस कार्यक्रम में कुछ लोग भगत सिंह के पुश्तैनी गांव से भी आए थे।''


 


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