एक चौथाई यूरोपवासी गरीबी और भुखमरी के शिकार

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Tuesday, December 10, 2013-3:44 PM

ब्रसेल्स: भुखमरी और गरीबी के लिए यूं तो अफ्रीकी और विकासशील एशियाई देशों का नाम दुनिया में सबसे ऊपर है, लेकिन सबसे विकसित माने जाने वाले यूरोपियाई संघ के देशों में भी इससे अभी तक पूरी तरह छुटकारा नहीं पाया जा सका है। बल्कि यूरोपियाई आयोग की ताजा आकड़े तो चौंकाने वाले हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपियाई संघ में पिछले वर्ष 12.48 करोड़ लोग गरीबी और भुखमरी के कगार पर पाए गए, जो पूरे यूरोपियाई संघ की आबादी का 24.8 फीसदी है। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि इन विकसित देशों में भी गरीबी घटने की बजाए बढ़ ही रही है।

वर्ष 2011 में इस क्षेत्र की 24.3 फीसदी आबादी ही गरीबी एवं भुखमरी की शिकार थी, जबकि 2008 में यह 23.7 फीसदी ही थी। और ऐसा तब है जब गरीबी, भुखमरी पर लगाम लगाना यूरोपियाई रणनीति-2020 के केंद्र में हैं। यूरोपियाई संघ में भी सर्वाधिक गरीबी झेलने वाले देश की बात करें, तो बुल्गारिया 49.3 फीसदी के साथ सबसे बुरी स्थिति में है। इसके बाद लातविया (37 फीसदी), ग्रीस (35 फीसदी), हंगरी (32 फीसदी) के नंबर पर आते हैं।

सर्वाधिक कम गरीबी वाले यूरोपियाई संघ के देशों में नीदरलैंड्स और चेक गणराज्य (दोनों 15 फीसदी) हैं। सबसे आश्चर्यजनक तस्वीरें तब उभरती हैं, जब हम इन अति विकसित देशों की तुलना अपने देश भारत से करें। विश्व बैंक के अनुसार, भारत में 2010 में अंतर्राष्ट्रीय गरीबी स्तर से नीचे रहने वाली आबादी का प्रतिशत 32.7 फीसदी था, जो कई यूरोपियाई देशों से बेहतर है।

हालांकि अपने ही देश के योजना आयोग द्वारा इसी वर्ष 22 जुलाई को जारी किए गए रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय भारत में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का प्रतिशत घटकर 21.9 फीसदी ही रह गया है। यूरोपियाई संघ के सांख्यिकी विभाग यूरोस्टैट द्वारा जारी इन ताजा आंकड़ों में तीन वर्गों में गरीब जनता को वर्गीकृत किया गया है-भुखमरी के शिकार लोग, गंभीर रूप से साधनविहीन लोग और बेहद कम काम की उपलब्धता वाले गरीब लोग। यूरोपियाई संघ के ये ताजा आंकड़े पूरे विश्व में गरीबी एवं भुखमरी के उन्मूलन की नई चिंताओं को जन्म दिया है।


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