हिंसा और बीमारी से खत्म हुई सिंधु घाटी सभ्यता: अध्ययन

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Friday, January 24, 2014-12:02 PM

वॉशिंगटन: लोगों के बीच हिंसा, संक्रामक रोगों और जलवायु परिवर्तन ने करीब 4,000 साल पहले सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का खात्मा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। यह दावा एक नए अध्ययन में किया गया है। नॉर्थ कैरोलिना स्थित एप्पलचियान स्टेट यूनिवर्सिटी में नृविज्ञान (एन्थ्रोपोलॉजी) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ग्वेन रॉबिन्स शुग ने एक बयान में कहा कि जलवायु, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों, सभी ने शहरीकरण और खात्मे की प्रक्रिया में भूमिका निभाई, लेकिन इस बारे में बहुत कम ही जानकारी है कि इन बदलावों ने मानव आबादी को किस तरह प्रभावित किया।

शोध पत्र के प्रमुख लेखक शुग ने कहा, ‘‘सिंधु घाटी सभ्यता का अंत और मानव आबादी का पुन:संगठित होना लंबे समय से विवादित रहा है।’’ यह शोध पत्र प्लॉस वन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यूनिवर्सिटी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि शुग और अनुसंधानकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने हड़प्पा के तीन दफन स्थलों से मानव कंकाल अवशेषों में अभिघात (ट्रॉमा) और संक्रामक बीमारी के सबूत की जांच की। हड़प्पा सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे बड़े शहरों में से एक था।

विज्ञप्ति में कहा गया कि उनका विश्लेषण लंबे समय से चले आ रहे इन दावों के विपरीत है कि सिंधु सभ्यता का विकास शांतिपूर्ण, सहयोगात्मक और समतामूलक समाज के रूप में हुआ, जहां कोई सामाजिक भेदभाव, वर्गीकरण नहीं था और आधारभूत संसाधनों तक पहुंच में कोई पक्षपात नहीं था।

विश्लेषण के अनुसार, हड़प्पा में कुछ समुदायों को अन्य के मुकाबले जलवायु परिवर्तन और सामाजिक आर्थिक क्षति का अधिक असर झेलना पड़ा, खासकर सामाजिक रूप से सुविधाहीन या हाशिए पर रहे लोगों को, जोकि हिंसा और बीमारियों के अधिक शिकार बनते हैं।

शुग ने कहा कि पूर्व के अध्ययनों में कहा गया था कि पारिस्थितिजन्य कारक पतन का कारण बने, लेकिन उन सिद्धांतों को साबित करने के लिए कोई संबंधित साक्ष्य नहीं था। पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में मौजूदा तकनीकों में सुधार आया है। उन्होंने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन के घटनाक्रमों का मानव समुदायों पर व्यापक असर पड़ता है। वैज्ञानिक ये अनुमान नहीं लगा सकते कि जलवायु परिवर्तन का असर हमेशा हिंसा और बीमारी जैसा होगा।’’

शुग ने कहा, ‘‘हालांकि, इस मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधु शहरों में तेजी से हुई नगरीकरण की प्रक्रिया, और व्यापक सांस्कृतिे संपर्क ने मानव आबादी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दीं। कुष्ठ और तपेदिक जैसे संक्रामक रोग संभवत: एक संपर्क क्षेत्र में संचरित हो गए जो मध्य एवं दक्षिण एशिया तक फैल गए।’’
 


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