दोषपूर्ण नीति के चलते खून से खेल रहे पाकिस्तानी : डॉन

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Friday, February 07, 2014-7:41 PM

इस्लामाबाद: पाकिस्तानी जनता ‘कश्मीर पर अपनी पूर्व की दोषपूर्ण नीतियों’ और ‘रक्षा प्रतिष्ठान के मूर्खतापूर्ण दुस्साहस’ के लिए अपने खून से खेल रही है। इस आशय की राय व्यक्त करते हुए पाकिस्तान के एक प्रमुख दैनिक ने शुक्रवार को कहा है कि रक्षा प्रतिष्ठान घाटी में ‘नन स्टेट एक्टरों’ (प्रायोजित आतंकवादियों) को घुसने की अनुमति दे रहा है और ‘कश्मीरी संघर्ष’ को नुकसान पहुंचा रहा है।

देश के प्रभावशाली अखबार डॉन ने ‘दोषपूर्ण कश्मीर नीति’ शीर्षक से अपने संपादकीय में कहा है, ‘‘यहां तक कि बुधवार को कश्मीर डे आयोजित किया गया, कुछ लोगों ने माना कि पाकिस्तान द्वारा पूर्व में प्रायोजित आतंकवादियों को पैदा करने से कश्मीर की आजादी को भारी नुकसान पहुंचा है।’’अखबार ने कहा है, ‘‘यह सच है कि कुछ राजनीतिक सरकारें ऐसी नीति में अंतर्निहित जोखिम से वाकिफ थीं, लेकिन सेना के अपने विचारों को लेकर अडिय़ल रवैये के कारण लाचार रही।’’

संपादकीय में कहा गया है कि समस्या सेना की इस दलील पर जोर देने में रहा है कि केवल वही जानती है कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति को किस तरह से संचालित करना है। एक बार जब सरकार इस बिंदु पर झुक गई तो यह व्यावहारिक रूप से सेना के हाथों में ‘संपूर्ण सुरक्षा मुद्दा अफगानिस्तान और कश्मीर से परमाणु हथियार तक’ चला गया।

संपादकीय में कहा गया है, ‘‘इस व्यावहारिकता ने विदेश विभाग को घुटनों के बल ला दिया और कश्मीर के मामले में इसने भारतीय कब्जे से कश्मीर की आजादी के संघर्ष को अवैधानिकता प्रदान की।’’ यह कहते हुए कि 1980 के दशक के आखिरी दौर में कश्मीर घाटी में ‘उबाल’ वाजिब और स्थानीय था, अखबार ने कहा है, ‘‘अधिकृत क्षेत्र में इस तरह के अभूतपूर्व विद्रोह से नई दिल्ली सन्न रह गई थी।’’ इस स्थिति से निपटने के लिए भारत के उपायों की आलोचना करते हुए अखबार ने आगे लिखा है, ‘‘स्थिति में त्रासद मोड़ तब आता है जब अफगानिस्तान में सोवियत की पराजय से मुदित आतंकवादी भारतीय हिस्से के कश्मीर में पहुंचने लगे।’’

अखबार ने आगे लिखा है, ‘‘इसने कुल मिलाकर कश्मीरी जनता के संघर्ष को एक नया और अवांछित आयाम दे दिया और पाकिस्तान घुसपैठ को सहारा देने वाले के रूप में दुनिया की नजरों में संदिग्ध हो गया।’’ संपादकीय ने आगे लिखा है, ‘‘9/11 के बाद आतंकवाद का मुद्दा वैश्विक स्तर पर उदित हुआ और भारत को प्रचार में तब जीत हासिल हो गई जब उसने कश्मीरी संघर्ष को अवैधानिक और स्वतंत्रता सेनानियों को आतंकवादी साबित करने में पश्चिम का असंदिग्ध समर्थन हासिल कर लिया।’’ डॉन ने लिखा है, ‘‘अफगानिस्तान के स्वतंत्र होने और दुनिया के दबाव में घाटी में प्रवेश निषिद्ध होने के बाद ‘बे-रोजगार’ हो गए आतंकवादियों ने अपनी बंदूक पाकिस्तान पर ही तान दी।’’


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