अत्यधिक खूबसूरत और प्रतिभा सम्पन्न चित्रांगदा फिल्मों के चयन को लेकर काफी ‘चूजी’ हैं। ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ से लेकर ‘देसी ब्वायज’ तक का उनका सफर मात्र 6 फिल्मों का रहा है। वह इस वर्ष ‘आई, मी और हम’ के अतिरिक्त शिरीष कुंदर की महत्वाकांक्षी फिल्म के एक गीत ‘काफिराना’ में नजर आएंगी। पेश हैं चित्रांगदा से एक मुलाकात के अंश :
*क्या आप यह कह सकती हैं कि आप एक माडर्न वूमैन हैं?
—मैं मेरठ की हूं। मेरे पिता आर्मी में रहे हैं और मैं पूरे हिन्दोस्तान में रही हूं। मैं वाकई देशभक्त हूं। मैं आजाद और माडर्न हूं लेकिन यह बात पश्चिमी होने से अलग है। माडर्न होने का मतलब यह है कि आप भविष्यवादी हों और व्यापक नजरिए से सोचते हों। उसका मतलब अच्छी कमाई करना नहीं बल्कि अपने सपनों को साकार और पूरा करना है।
*क्या आप सोचती हैं कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में पुरुष कलाकारों का वर्चस्व है और नायकों को हमेशा ही ज्यादा महत्व दिया जाता है?
—हालात बदल रहे हैं। निर्देशकों को अब ऐसी स्क्रिप्ट्स तैयार करवानी पड़ रही है और मेरा ख्याल है कि विद्या (बालन) इस सोच में बदलाव ला रही हैं। स्त्रियों को भी अहमियत दी जाती है, बगैर किसी स्त्री के कोई फिल्म नहीं बनाई जा सकती है।
*क्या आप बोल्ड रोल्स का भी स्वागत करेंगी?
—देखिए यह तो आत्मविश्वास का मामला है। आधुनिकता तो आपके दिमाग के भीतर होनी चाहिए।
*क्या आपने ‘देसी ब्वायज’ को इसलिए स्वीकार किया कि आप अपनी आर्टी इमेज को तोडऩा चाहती थीं?
—जी नहीं, यह अपनी इमेज को बदलने के लिए किया गया कोई सोचा-समझा प्रयास नहीं था। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ कि मैं एक ही तरह का काम करते-करते बोर हो गई थी। हर दफा एक-सी चीजें करते हुए आप आखिर कितने इंटैंस हो सकते हैं? जब रोहित (धवन) मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए तो मैं फौरन जान गई कि यह कोई बे-सिर पैर की कामेडी नहीं है।
*आप आगे कमर्शियल सिनेमा ज्यादा करना चाहेंगी या आफ बीट फिल्में?
—मुझे नहीं लगता कि मैं लौटकर फिर से वहां जाऊंगी जहां मैं हुआ करती थी। मैं वही करूंगी जिससे मुझे संतुष्टि मिलेगी और जिसे करने में मुझे मजा आएगा। निश्चय ही मैं ऐसे रोल करना चाहूंगी जिनमें मेरे करने को काफी होगा। मेरे लिए सामने आने वाला हर काम उस समय तक ठीक है जब तक मैं अपना काम अच्छी तरह से करती हूं। पर्दे पर आप जो प्रस्तुत करती हैं और जिस तरह परफार्म करती हैं वहीं आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
*व्यक्तिगत रूप से आप कौन-सी फिल्में देखना ज्यादा पसंद करती हैं?
—यह तो अलग-अलग स्थितियों पर निर्भर करता है। मुझे तो ‘थैंक- यू’ और ‘सिंह इज किंग’ तक अच्छी लगीं।
*क्या हीरोइनों की आपस में पटरी मुश्किल से बैठा करती है? सुनने को मिला था कि ‘देसी ब्वायज’ की शूटिंग के दौरान दीपिका पादुकोण और आपके बीच कुछ विवाद जैसा हुआ?
—असलियत तो यह है कि हम दोनों ने सिर्फ 2 दिन एक-दूसरे के साथ काम किया है और वह भी एक गीत के लिए। हमारा कोई डायलॉग एक साथ नहीं है। इसलिए इन बातों में कोई सच्चाई नहीं है। वह बहुत ही अच्छी लड़की है और बेहद प्रोफैशनल हैं।
*जब आप कालेज में थीं तो क्या मर्दों का ध्यान आप पर अटका रहता था?
—वैसे तो मैं जिस स्कूल में थी वह और जिस कालेज में थी वह भी सिर्फ लड़कियों के लिए ही था लेकिन इसके बावजूद मेरी तरफ काफी मर्दों का ध्यान लगा रहता था।