अमावस्या: पितरों को कहें अलविदा, पाएं धन कुबेर बनने का आशीर्वाद

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Thursday, September 29, 2016-11:48 AM

जीवन काल में लोगों से पाप व पुण्य दोनों कर्म होते हैं। इन्ही कर्मो के आधार पर मृत्यु उपरांत जीव को मोक्ष या अघम प्राप्त होता है। शास्त्रानुसार यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने पितृ के निमित्त धर्मानुसार कुछ ऐसे कर्म करें जिससे उन्हें अघम से मुक्ति मिले अथवा वे जिस भी योनियों में हो उन्हें वहां पर शांति प्राप्ति हो। वायु पुराण, अग्नि पुराण व गरुड़ पुराण में पितर ऋण से मुक्त होने हेतु पिंड, तर्पण, श्राद्ध, दान हेतु अत्यधिक महत्व कहा गया है परंतु वर्तमान काल में अधिकांश लोग शास्त्रोक्त विधि को न जानने के कारण या जानते हुए भी लापरवाही के कारण केवल रस्मी तौर पर ही पितरों के प्रति अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, इससे पितरों को कष्ट पहुंचता है अतः वह रुष्ट होकर हमें कठिनाइयां व अस्थिरताएं देते हैं। 


सूर्य की अनंत किरणों में सर्वाधिक प्रमुख किरण का नाम 'अमा' है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से ही सूर्यदेव तीनों लोको को प्रकाशित करते हैं। उसी अमा किरण में तिथि विशेष को चंद्रदेव निवास (वस्य) करते हैं, अतः इस तिथि का नाम अमावस्या है। अमावस्या प्रत्येक पितृ संबंधी कार्यों के लिए अक्षय फल देने वाली बताई गई है। शास्त्रानुसार वैसे तो प्रत्येक अमावस्या पितृ की पुण्य तिथि होती है परंतु आश्विन मास की अमावस्या पितृओं के लिए परम फलदायी कही गई है। इसे सर्व पितृ विसर्जनी अमावस्या अथवा महालया के नाम से जाना जाता है।


आश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ का पृथ्वी पर निवास होता है, इस काल में वे अपने घर व संबंधियों के आस-पास रहते है, अत: अश्विन अमावस्या को पितृ उत्सव कहा गया है। 2016 में आश्विन अमावस्या शुक्रवार दिनांक 30.09.16 को प्रातः 3 बजकर 55 मिं॰ से प्रारंभ होकर शनिवार दिनांक 01.10.16 को प्रातः 5 बजकर 41 मिं॰ तक रहेगी। अतः सर्व पितृ अमावस्या पर्व शुक्रवार दिनांक 30.09.16 को मनाया जाएगा। सर्व पितृ अमावस्या पर हर श्राद्धकर्ता को दोपहर में श्रद्धा से ब्राह्मण भोजन अवश्य ही कराना चाहिए। इस दिन पितृ के निमित पिंड, तर्पण, श्राद्ध हेतु सर्वश्रेष्ठ महूर्त गज छाया कहा गया है। गज छाया में प्रथम महूर्त कुतुप है जो की प्रातः 11 बजकर 45 मिनट से प्रारंभ होकर दिन 12 बजकर 34 मिनट तक चलेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दिन 12 बजकर 34 मिनट से दिन 1 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। इसके उपरांत अंतिम मुहूर्त अपराह्न दिन 1 बजकर 21 मिनट से शाम 3 बजकर 42 मिनट तक रहेगा।


दक्षिणाभिमुख होकर, आचमन करें व जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर व शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धापूर्वक पितृओं को अर्पित कर पिंडदान करें। गीता के सातवें अध्याय का पाठ करें व उसका पूरा फल पितृ को समर्पित करें। पहला पिंड देवताओं के निमित दान करें, दूसरा ऋषियों हेतु, तीसरा पिंड दिव्य मनुष्यों हेतु, चौथा दिव्य पितृ हेतु, पांचवां यम हेतु, छठा मनुष्य पितृ हेतु, सातवां मृतात्मा हेतु, आठवां पुत्र रहितों पितृ हेतु, नौवां उच्छिन्ना कुलवंश पितृ हेतु, दसवां गर्भपात से मारे पितर हेतु, ग्यारहवां पूर्व जन्म के बंधुओं हेतु व बारहवां पिंड दान अज्ञात पूवजों के निमित दान करें। इसके बाद जल में काले तिल, जौ, कुशा व सफेद फूल मिलाकर जल से विधि पूर्वक तर्पण करें। इससे पितृ तृप्त होते हैं। श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन से पितृ को संतुष्ट मिलती है। भोजन उपरांत ब्राह्मण को सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें। इसके बाद गाय, कुत्ते, कोए व चीटियों का भोजन निकालें तथा गाय को 5 फल भी अवश्य खिलाएं।


आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com

Edited by:Aacharya Kamal Nandlal

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