बाल सुरक्षा की उपेक्षा से बढ़ते अपराध

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Monday, December 18, 2017-3:46 AM

भोंडसी के रेयान इंटरनैशनल स्कूल में दूसरी कक्षा का छात्र 7 वर्षीय प्रद्युम्न ठाकुर 8 सितम्बर को स्कूल के टायलेट में मृत मिला था। उसका गला रेत कर उसकी हत्या की गई थी। इस घटना ने देश भर की आत्मा पर चोट की और अभिभावकों में गुस्से, भय तथा नाराजगी की लहर फैल गई और सभी ने एक समान रूप से महसूस किया कि अब वक्त है कि दोषियों को पकड़ कर सजा दी जाए। 

सी.बी.आई. ने अपनी जांच में पाया कि कंडक्टर नहीं, स्कूल का ही एक छात्र कथित रूप से प्रद्युम्न का हत्यारा है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सी.बी.आई. ने सी.सी.टी.वी. फुटेज का सहारा लिया। परंतु स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली दर्दनाक घटनाओं में यह पहला या अंतिम मामला नहीं है। हाल ही में स्कूल में 3 बच्चियों से बलात्कार के मामले सुर्खियों में थे। कई लोगों को लगता है कि ऐसा निजी स्कूलों की पैसा बचाने वाली नीतियों के चलते बच्चों की सुरक्षा में कटौती करने की वजह से होता है परंतु वास्तव में बच्चों के साथ दर्दनाक तथा अमानवीय अपराध निजी तथा सरकारी दोनों स्कूलों में एक समान रूप से हो रहे हैं। बात न मानने पर छात्राओं के कपड़े उतरवाने जैसे अमानवीय कृत्य स्कूली बच्चों के साथ पहले से कहीं ज्यादा हो रहे हैं। 

शहरों में स्कूलों ने कैम्पस तथा आस-पास सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने में अभी भी निवेश नहीं किया है। हालांकि, 93 प्रतिशत स्कूलों का दावा है कि कैम्पस तथा प्रवेश पर उनका पूर्ण नियंत्रण है परंतु प्रमुख समस्या गार्ड्स की सुरक्षा जांच तथा उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण है। विभिन्न सरकारों ने तो समय-समय पर शिक्षकों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण करवाने के निर्देश भी दे रखे हैं परंतु वास्तव में इन नियमों का जरा भी पालन नहीं किया जा रहा है। दरअसल ऐसे कोई एक-समान नियम तय नहीं हैं जिनसे सभी राज्य सरकारें सहमत हों। देश में एक-समान नीतियों के अभाव में प्रत्येक स्कूल का प्रयास अत्यधिक जटिलताओं में फंसने से बचने का होता है। 

यदि अमेरिकी स्कूलों के सुरक्षा नियमों का अध्ययन किया जाए तो वहां स्कूल की इमारत के निर्माण से लेकर कैंटीन तक स्थापित करने के लिए स्थानीय निकाय से स्वीकृति लेनी होती है। कक्षा क्षेत्र में प्रवेश से पहले अभिभावकों को रजिस्टर में हस्ताक्षर करने होते हैं। बच्चों की मांएं स्कूल की रसोई, कैंटीन अथवा डाइङ्क्षनग हॉल में वालंटियर के रूप में काम कर सकती हैं। वे बच्चों को भोजन परोसने में सहायता कर सकती हैं तथा सुबह बच्चों को स्कूल पहुंचने में सहायता के लिए भी वालंटियर कर सकती हैं। अभिभावकों की सहभागिता से लेकर स्कूल के कामकाज तथा समीक्षा से जुड़े प्रश्नों का वहां के स्कूल खुल कर स्वागत करते हैं। पेरैंट्स-टीचर मीटिंग्स केवल बच्चों के प्रदर्शन पर चर्चा तक ही सीमित नहीं होती हैं बल्कि स्कूलों को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने पर भी इनके दौरान पूरा ध्यान दिया जाता है। 

एक और दिशा में गम्भीरता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यह है शिक्षा विभाग तथा समाज सेवकों द्वारा स्कूलों का नियमित तथा औचक निरीक्षण। दुख की बात है कि बच्चों को पेश आने वाली भावनात्मक समस्याओं से निपटना तो दूर की बात है, देश भर के स्कूल आग लगने, भूकम्प जैसी आपदाओं अथवा अन्य सुरक्षा उल्लंधनों  से निपटने में ही अक्षम हैं। समस्या का एक हिस्सा स्कूलों में कार्यरत दर्जा 3 तथा 4 अस्थायी कर्मचारी भी हैं। बस ड्राइवर तथा क्लीनर तक को पक्की नियुक्ति नहीं दी जाती है ताकि वेतन के खर्च को कम से कम रखा जा सके जबकि चाहिए तो यह कि बच्चों की शारीरिक तथा भावनात्मक सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी जाए। 

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