श्रीमद्भगवद्गीता: जन्म तथा मृत्यु के पथ को जीता जा सकता है

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Tuesday, October 25, 2016-2:45 PM

श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप व्याख्याकार : स्वामी प्रभुपाद 

अध्याय छह ध्यानयोग

योगाभ्यास का चरम लक्ष्य 

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस:।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।। 15।।


युञ्जन्—अभ्यास करते हुए; एवम् —इस प्रकार से; सदा—निरंतर; आत्मानम्—शरीर, मन तथा आत्मा; योगी—योग का साधक; नियत-मानस:—संयमित मन से युक्त; शान्तिम्—शांति को; निर्वाणपरमाम्— भौतिक अस्तित्व का अंत;  मत्- संस्थाम्—चिन्मयव्योम (भगवद्धाम) को; अधिगच्छति— प्राप्त करता है। 


अनुवाद: इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्म में निरंतर संयम का अभ्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है।


तात्पर्य : अब योगाभ्यास के चरमलक्ष्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है। योगाभ्यास किसी भौतिक सुविधा की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता, इसका उद्देश्य तो भौतिक संसार से विरक्ति प्राप्त करना है। जो कोई इसके द्वारा स्वास्थ्य लाभ चाहता है या भौतिक सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक होता है वह भगवद् गीता के अनुसार योगी नहीं है। न ही भौतिक विरक्ति का अर्थ शून्य में प्रवेश है क्योंकि यह कपोलकल्पना है।


भगवान की सृष्टि से कहीं भी शून्य नहीं है। उलटे भौतिक विरक्ति से मनुष्य भगवद्धाम में प्रवेश करता है। भगवद् गीता में भगवद्धाम का भी स्पष्टीकरण किया गया है कि यह वह स्थान है जहां न सूर्य की आवश्यकता है, न चांद या बिजली की। भगवद्धाम (वैकुंठ) के सारे लोक उसी प्रकार से स्वत: प्रकाशित हैं जिस प्रकार सूर्य द्वारा यह भौतिक आकाश। वैसे तो भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु चिन्मयव्योम तथा उसके लोकों को ही परमधाम कहा जाता है।


एक पूर्णयोगी जिसे भगवान कृष्ण का पूर्णज्ञान है जैसा कि यहां भगवान ने स्वयं कहा है (मच्चित, मत्पर:, मत्स्थानम्) वास्तविक शांति प्राप्त कर सकता है और अंतत: कृष्णलोक या गोलोक वृंदावन को प्राप्त होता है। 


ब्रह्म संहिता में (5.37) स्पष्ट उल्लेख है- गोलोक एवं निवसत्यखिलात्मभूत: -यद्यपि भगवान सदैव अपने धाम में निवास करते हैं, जिसे गोलोक कहते हैं तो भी वह अपनी परा-आध्यात्मिक शक्तियों के कारण सर्वव्यापी ब्रह्म तथा अंतर्यामी परमात्मा हैं। कोई भी कृष्ण तथा विष्णु रूप में उनके पूर्ण विस्तार को सही-सही जाने बिना वैकुंठ में या भगवान के नित्यधाम (गोलोक वृंदावन) में प्रवेश नहीं कर सकता। अत: कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही पूर्णयोगी है क्योंकि उसका मन सदैव श्री कृष्ण के कार्यकलापों में लीन रहता है (स वै मन: कृष्णपदारविन्दयो:)। 


वेदों में भी (श्वेताश्वतर उपनिषद 3.8) हम पाते हैं- तमेव विदित्वाति मृत्युमेति- केवल भगवान श्री कृष्ण को जानने पर जन्म तथा मृत्यु के पथ को जीता जा सकता है। दूसरे शब्दों में योग की पूर्णता संसार से मुक्ति प्राप्त करने में है।


(क्रमश:)
 


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