कलंक चौथ: चंद्रमा को अर्ध्य देते समय करें मंत्र जाप, मिलेगा यश और वैभव

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Saturday, September 03, 2016-11:55 AM
कोई भी पूजा अर्चना, देव पूजन, यज्ञ, हवन, गृह प्रवेश, विद्यारंभ, अनुष्ठान हो सर्वप्रथम गणेश वंदना ही की जाती है ताकि हर कार्य बिना किसी विध्न के समाप्त हो जाए। हर मांगलिक कार्य में सबसे पहले श्री गणेश की पूजा करना भारतीय संस्कृति में अनिवार्य माना गया है।  
 
कैसे करें पूजा ?
पूजन से पूर्व शुद्ध होकर आसन पर बैठें। एक ओर पुष्प, धूप, कपूर, रौली, मौली, लाल चंदन, दूर्वा , मोदक आदि रख लें। एक पटड़े पर साफ पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर गणेश जी की प्रतिमा जो मिट्टी से लेकर सोने तक किसी भी धातु में बनी हो, स्थापित करें। गणेश जी का प्रिय भोग मोदक व लडडू हैं।
 
मूर्त पर सिंदूर लगाएं, दूर्वा अर्थात हरी घास चढ़ाएं व षोडशोपचार करें। धूप, दीप, नैवेद्य, पान का पत्ता, लाल वस्त्र तथा पुष्पादि अर्पित करें। इसके बाद मीठे मालपुओं तथा 11 या 21 लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए। 
 
गणेश प्रतिमा का विसर्जन करने के बाद उन्हें अपने यहां लक्ष्मी जी के साथ ही रहने का आमंत्रण करें। यदि कोई कर्मकांडी यह पूजा सम्पन्न करवा रहा है तो उसका आशीष प्राप्त करें। सामान्यत: तुलसी के पत्ते छोड़कर सभी पत्र- पुष्प गणेश प्रतिमा पर चढ़ाए जा सकते हैं। गणपति जी की आरती से पूर्व गणेश स्तोत्र या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें। 
 
रात को नीची नजर करके चंद्रमा को अर्ध्य दें, इस मंत्र का जाप करें-
 
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:! निर्विघ्न कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा 
 
अर्थात आपका एक दांत टूटा हुआ है तथा आप की काया विशाल है और आपकी आभा करोड़ सूर्यों के समान है। मेरे कार्यों में आने वाली बाधाओं को सर्वदा दूर करें। प्रथम पूज्य गणेश ज‍ी की आराधना से रिद्धि-सिद्धि, यश और वैभव प्राप्त होता है।
 
इसके अतिरिक्त इन मंत्रों से भी गणेश जी को प्रसन्न कर सकते हैं। 
 
“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरदे नम:”
‘ओम् गं गणपत्ये नम:’ 
 
गणेश जी की शरण में जो जाता है वह अवश्य इस लोक में पूज्य होकर मरणोपरांत मोक्ष गति को प्राप्त होता है।  

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