आज है काल ‘सिद्धियों’ की रात, ठीक 12 बजे करें ये पूजन

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Saturday, October 08, 2016-9:31 AM

नवरात्र सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी द्वार खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। इस दिन तांत्रिक मतानुसार देवी पर मदिरा का भोग भी लगाया जाता है।

 

नवरात्र की सप्तमी में साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है। कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। नवरात्र सप्तमी तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। इस दिन आदिशक्ति की आंखें खुलती हैं। 

 

ज्योतिष दृष्टिकोण: मां कालरात्रि की साधना का संबंध शनि ग्रह से है । कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में शनि ग्रह का संबंध दशम और एकादश भाव से होता है अतः मां कालरात्रि की साधना का संबंध करियर, कर्म, प्रोफैशन, पितृ, पिता, आय, लाभ, नौकरी, पेशे से है । जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में शनि ग्रह नीच, अथवा शनि राहू से युति कर पितृ दोष बना रहा है अथवा शनि मेष राशि में आकार नीच एवं पीड़ित है उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां कालरात्रि की साधना। 


मां कालरात्रि कि साधना से व्यक्ति को आलस्य से छुटकारा मिलता है, भक्त का कर्म क्षेत्र मज़बूत होता है, पद्दोन्नति की प्राप्ति होती है, आय स्रोत अच्छे होते हैं, लाभ क्षेत्र मज़बूत होता है।  इनके पूजन से शत्रुओं का संहार होता हैं। जिन व्यक्ति की आजीविका का संबंध कंस्ट्रक्शन, मकैनिकल, इंजीनियरिंग, हार्डवेयर अथवा पशुपालन से हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां कालरात्रि की साधना ।


साधना वर्णन: नवरात्र की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि के स्वरूप की ही उपासना की जाती है।  देवी कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है। सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इनका ध्यान इस प्रकार है


करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥


अर्धरात्रि में ठीक 12 बजे देवी कालिका का षोडष उपचार पूजन करें तथा सूखे नारियल के गोले में कर्पूर जलाकर रखें तथा काली का स्मरण करते हुए नारियल के जलते हुए गोले में देवी का यह मंत्र बोलते हुए शराब डालें। 

मंत्र: क्रीम् क्रीम् क्रीम् दक्षिण कालिके प्रसीद प्रसीद क्रीम् क्रीम् क्रीम् फट् स्वाहा 

आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com

Edited by:Aacharya Kamal Nandlal
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