पढ़ें: क्या है खजाने की असली हकीकत

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Friday, October 18, 2013-8:47 PM

उन्नाव: संत शोभन सरकार और ज्ञान से सुसज्जित वैज्ञानिकों की तकनीकी ने भले आज राजा राव रामबक्श सिंह के किले में खजाना खोजा हो, लेकिन गांव वाले तो खजाने का राज बहुत पहले से ही पूर्वजों से सुनते आए हैं। बच्चे-बच्चे भी जानते हैं कि किले में अकूत स्वर्ण भंडार भरा है। किसी अनिष्ट की आशंका में किसी ने कभी उसे निकालने की कोशिश नहीं की।

गांव के ही कई लोगों ने यहां खजाना होने की बात को कबूला है। गांव वालों के मुताबिक अब तक शोभन सरकार की मर्जी नहीं थी, इसलिए खुदाई नहीं हुई। किसी और की मर्जी से खुदाई होने पर अनिष्ट तय है, इसलिए कभी किसी ने दुस्साहस नहीं किया। गांव में हर जुबां पर किले में खजाना होने का गाना है। शोभन सरकार की तरह गांव वाले भी बताते हैं कि नानाराव पेशवा से राजा राव रामबक्श की दोस्ती थी। अंग्रेजी शासन काल में उन्होंने सुरक्षित रखने के लिए खजाना यहां भिजवा दिया था।

राजा राम बख्श सिंह का किला

उन्नाव का डौडिया खेड़ा गांव में राजा राम बख्श सिंह का किला है। किले में वीरानगी और खंडहर है। राजा राव रामबक्श सिंह ने पूजा अर्चना करने के लिए मुख्यद्वार के पास विशाल शिव मंदिर बनवाया था। इसे बाबूजी राव शिवाला के नाम से जाना जाता है। किले के गुंबद पर त्रिशूल आज भी सुशोभित है। वैसे तो अधिकांश शिव मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल होता है, लेकिन इस मंदिर का त्रिशूल इतिहास समेटे है। खजाने का राज भी इससे जुड़ा है। किवदंती भी है कि सूरज की पहली किरण जब त्रिशूल पर पड़ती है तो मंदिर ऊंचा होने के कारण त्रिशूल की छाया किले में बने कुएं के पास पड़ती है। राजा ने खजाने को सुरक्षित रखने के लिए इसी स्थान को चुना, ताकि कभी स्थान को लेकर किसी तरह की भूल या भ्रम न हो। कोई देखरेख न होने के कारण किले में भारी भरकम बबूल के पेड़ के साथ झाड़ियां उग आई हैं, लेकिन त्रिशूल आज भी खजाने के स्थान की शान से गवाही दे रहा है।

खजाना राम बख्श का नहीं, बल्कि त्रिलोकचंद का है
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यूपी के उन्नाव जिले के डौडिंयाखेड़ा रियासत के जिस किले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जिस खजाने की खोज के लिये खुदाई कर रहा है वो खजाना राजा राव रामबख्श सिंह का नहीं, बल्कि उनके पूर्वज महाराज त्रिलोकचंद का है, क्योंकि राजा राव रामबख्श ने यहां सिर्फ आठ साल राज किया था।

दरअसल, ये खजाना सोलहवीं शताब्दी में यहां राज करने वाले महाराज त्रिलोकचंद ने जुटाया था और ये खजाना वहीं मंदिर के पीछे स्थित टीले में हो सकता है जहां एक समय रामबख्श के पिता बाबू बंसत सिंह की बैठक हुआ करती थी। साथ ही ये खजाना किलें की दीवारों में भी हो सकता है। इस खजाने का एक नक्शा भी है जिसें राजा रामबक्श नें अपनी मां के पास छोड़ दिया था। रामबक्श की मां फतेहपुर रियासत की थीं। ये दावा डोंडियाखेड़ा रियासत के जमींदार विशेश्वर सिंह के बेटे प्रोफेसर लालअमरेन्द्र सिंह का है जो अब लखनऊ में रहते हैं। अमरेन्द्र सिंह के पिता विशेश्वर सिंह नें 1924 में लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री ली थी और वहीं डौंडियाखेडा में डाक्टरी की प्रैक्टिस करते थे जिन्हें रामबक्श ने जमींदार बना दिया था।

किले के पास जो मंदिर है उसे राजा रामबक्श ने ही बनवाया था। लेकिन मंदिर के शिखर की स्थापना और मूर्ति स्थापना 1932 में जमींदार विशेश्वर सिंह ने करायी थी। रामबक्श की मां फतेहपुर जिले के आजमपुर की थी। जहां के बारे में भी बाबा सोभन सरकार ने ये दावा किया है कि खजाने का एक हिस्सा वहां भी गड़ा है। माना जाता है कि रामबक्श ने खजाने का विवरण अपनी मां को बताया था।

प्रोफेसर लाल अमरेन्द्र सिंह के मुताबिक खजाने की खोज के लिये इसके पहले भी खुदाई हो चुकी है जिसे मुरारमऊ के राजा शिवप्रसाद सिंह नें कराया था। प्रोफेसर अमरेन्द्र सिंह का कहना है कि खजाने का एक बड़ा हिस्सा मंदिर के पीछे मौजूद टीले में हो सकता है, क्योकि वो राजा रामबक्श के पिता बसंत सिंह की बैठक हुआ करती थी। उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लोग खुदाई के लिये आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं जिसमें एक सैटेलाइट के द्धारा जमींन के अंदर छुपे मेटल का पता लगाया जाता है। दूसरी तकनीक जाइगर काउंटर है जिसके जरिये जमींन के अंदर छुपे मेटल का पता लगाया जाता है।


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