नई पहचान बनाने की ओर शिअद

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Monday, October 21, 2013-12:10 PM


नई दिल्ली,  पंजाब में दोबारा सत्ता में आकर इतिहास रचने वाली देश की दूसरी सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी शिरोमणि अकाली दल (बादल)  ने बदले राजनीतिक समीकरण के चलते भाजपा पर दबाव बनाने का प्रयास शुरू कर दिया है। शिअद जानता है कि आपसी कलह से परेशान भाजपा पर दबाव बनाने का इससे अच्छा मौका उसे शायद ही मिले। दिल्ली में अपने बूते पर चुनाव लड़कर और कुछ सीटें जीतकर शिअद राष्ट्रीय पार्टी बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

दिल्ली में गुरूद्वारा चुनाव के दौरान ही सुखबीर सिंह बादल ने ऐलान कर दिया था कि यह चुनाव उनके और पार्टी के लिए सेमीफाइनल है। फाइनल तो विधानसभा का चुनाव होगा। कुशल प्रबंधन के बल पर पंजाब में दो-दो चुनाव जीतने के बाद सुखबीर सिंह बादल के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह दिल्ली में हर मोर्चे पर कांग्रेस सरकार से विपक्ष की तरह लड़ाई लड़ रहे हैं। सुखबीर सिंह बादल दिल्ली चुनाव के लिए इसलिए भी ज्यादा परेशान हैं क्योंकि अगर यहां से उन्हें दो सीटें भी मिल जाती हैं तो पंजाब से बाहर उनकी पार्टी का खाता खुल जाएगा।

जहां एक तरफ दोनों दलों के अलग-अलग चुनाव लडऩे की चर्चाएं शुरू हो गई है। दोनों पार्टियों के दिल्ली में स्थित शीर्ष नेतृत्व बैठकों के जरिए मामला सुलझाने में लगे है। वहीं चर्चाओं को बल देते हुए शिअद की दिल्ली यूनिट के वरिष्ठ नेता गठबंधन के फैसले को हाईकमान पर छोडऩे की बात कहते हुए विधानसभा चुनाव में 12 सीटों पर चुनाव लडऩे की पूरी तैयारी का दम भर रहें है।

निहारिका (सिख राजनीति में सक्रिय) :- गठबंधन का फैसला हाईकमान करेगा। लेकिन अकाली दल ने जिन सीटों पर दावेदारी रखी है उन सीटों पर अकाली उम्मीदवारों की लोगों के बीच पैठ है। जिसका फायदा गठबंधन को आने वाले चुनावों में मिल सकता है।

सरदार बलविन्दर सिंह (स्थानीय निवासी पंजाबी बाग): भाजपा और अकाली दल पुराने साथी रहें है और दोनों एक साथ चुनाव लडें तो अ'छा होगा। अगर दोनों साथ चुनाव नहीं लड़ते तो कांग्रेस को फायदा मिलगा और भाजपा को इसका नुकसान होगा।

सरदार सुरेन्द्र सिंह (स्थानीय निवासी पंजाबी बाग) : कुछ सीटों पर सिख समाज की वोटों का दबदबा है। अकाली दल के समर्थन से भाजपा को वो वोट मिलता है। अगर दोनों अलग-अगल चुनाव लड़ते है और भाजपा को नुकसान होगा। लेकिन अकाली दल भी चुनावों में सीट नहीं निकाल पाएगी।


सरदार हरजीत सिंह (व्यपारी) मुझे नहीं लगता दोनों दल एक-दूसरे के बिना दिल्ली में चुनाव लड़ेंगे। चुनावी बिगुल बजने के बाद दोनों पार्टियों के बीच टिकटों को लेकर रस्साकशी चालू है। जल्द ही स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।


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