सी.बी.आई. ने प्रधानमंत्री कार्यालय से मांगी हिंडाल्को की फाइलें

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Wednesday, October 23, 2013-3:44 PM

नई दिल्ली: सी.बी.आई. ने मंगलवार को प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर हिंडाल्को को कोयला ब्लॉक आबंटन से संबंधित सभी रिकार्ड मांगे। प्रधानमंत्री कार्यालय ने 3 दिन पहले ही कहा था कि प्रधानमंत्री ने इस आबंटन को मंजूरी मामले की उस ‘पात्रता’ के आधार दी थी जो उनके समक्ष रखी गई थी।
      सी.बी.आई. सूत्रों ने कहा कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट मेें स्थिति रिपोर्ट दायर करने के बाद उठाया गया जिसमें जांच एजैंसी ने आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमार मंगलम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव पी. सी. पारेख के खिलाफ दर्ज नवीनतम मामले के बारे में न्यायालय को जानकारी दी। सी.बी.आई. ने प्राथमिकी में ‘सक्षम प्राधिकार’ का भी उल्लेख किया है जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने बयान में बताया है कि वह सक्षम प्राधिकार प्रधानमंत्री थे जो यह निर्णय लेते समय वर्ष 2005 में कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे। प्रधानमंत्री कार्यालय ने तालाबिरा कोयला ब्लॉक का आबंटन हिंडाल्को को करने के निर्णय को ‘उचित’ बताया है।
सी.बी.आई. ने एक बयान में कहा कि वह आगे की कार्रवाई पर कोई भी निर्णय करने से पहले मामले के उस प्रत्येक पहलू की जांच करेगी जिसका उल्लेख उसकी प्राथमिकी में है। सी.बी.आई. ने कहा कि फिलहाल जांच चल रही है। हम आगे की कार्रवाई पर कोई भी निर्णय करने से पहले प्राथमिकी के प्रत्येक पहलू की जांच करेंगे। प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि ‘सक्षम प्राधिकार’ ने उस जांच समिति की सिफारिशों को मंजूर कर लिया था जिसने ‘वैध कारणों’ का उल्लेख करते हुए हिंडाल्को का आवेदन खारिज कर दिया गया था, उसे बिड़ला से 17 मई 2005 और 17 जून 2005 की तिथि वाले पत्र मिले थे जिसमें उसने तालाबिरा 2 कोयला ब्लाक का आबंटन स्वयं को करने का अनुरोध किया था। इन पत्रों को कोयला मंत्रालय को अग्रसारित कर दिया गया था। इसमें कहा गया है कि बिड़ला ने ब्लाक का आबंटन के अनुरोध के साथ पारेख से जुलाई 2005 में मुलाकात की थी।
   प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है, ‘‘इन पत्रों के अनुरूप और पारेख और बिड़ला के बीच मुलाकात के बाद पारेख ने अपने पद का दुरूपयोग किया और तालाबिरा 3 के साथ तालाबिरा 2 का आबंटन बिना किसी वैध आधार या परिस्थितियों में कोई परिवर्तन किए बिना हिंडाल्को को करने की सिफारिश कर दी। पारेख के ऐसा करने के पीछे एकमात्र इरादा अनुचित पक्ष लेना था।’’ पारेख ने दलील दी है कि उन्होंने सिफारिश की लेकिन वह प्रधानमंत्री थे जिन्होंने उस पर अंतिम निर्णय किया।
 


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