मोदी के साथ खड़े होना ही वी.के. सिंह का अपराध

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Wednesday, October 23, 2013-5:59 PM

सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह की सेवानिवृत्ति के पहले और बाद से संबंधित अनेक बातें कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाती हैं जिनका न केवल रक्षा बलों के मनोबल बल्कि देश की सुरक्षा से भी गहरा संबंध है। हम किसी प्रकार के दोषारोपण के खेल में नहीं उलझना चाहते क्योंकि इससे सार्वजनिक नीति से संबंधित सरल बातों का भी राजनीतिकरण हो जाता है और रक्षा के संवेदनशील क्षेत्र का वातावरण दूषित हो जाता है।

हमारा उद्देश्य मुद्दे उठाना और इनके ईमानदारी भरे उत्तर तलाशना है ताकि यह पता लगाया जा सके कि अपनी बेदाग छवि तथा ईमानदारी के लिए विख्यात यह सेनापति यू.पी.ए. सरकार के कोप और बदलाखोरी की भावना का शिकार क्यों हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जो विवादित शस्त्र सौदों का मुद्दा उठाया उससे सत्ता की दलाली करने वाले निहित स्वार्थ और रक्षा अधिष्ठान की बागडोर थामने वाले राजनीतिक समूह के भागीदारों के हित आहत हुएहैं?

सरकार के इस रवैये के पीछे कौन-से अज्ञात कारण हो सकते हैं? यह तो सब जानते हैं कि जनरल वी.के. सिंह दिलेर, निडर और प्रोफैशनल तौर पर सक्षम हैं। वह कभी गोल-मोल बात नहीं करते। उनकी देशभक्ति पर उंगली नहीं उठाई जा सकतीऔर न ही उनकी प्रोफैशनल ईमानदारी पर सवाल खड़ा किया जा सकता है। शायद अपनी भावनाओं कोउजागर करने में उन्होंने चुस्ती-चालाकी से काम नहीं लिया। ऐसी स्थिति में जनरल के व्यवहार में तकनीकी नुक्स तो निकाले जा सकते हैं लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि औसत राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की तुलना में जीवन और इसकी चुनौतियों को अलग नजरिए से देखने वाले स्पष्टवादी और ईमानदार लोगों का यही बुनियादी लक्षण होता है।

हमारे लिए जनरल को राजनीतिक व्यक्ति समझना भी उचित नहीं होगा क्योंकि अपने सेवाकाल के दौरान वह राजनीति से दूर ही रहे। रिटायर होने के बाद उन्हें जीवन का नया मार्ग तलाशने का पूरा अधिकार है। इससे पहले भी कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ऐसा कर चुके हैं। वी.के. सिंह को सरकार के कुछ चहेते जनरलों की तरह रिटायरमैंट के बाद सुख-सुविधाओं वाली कोई शानदार पदवी निश्चय ही नहीं मिल सकती क्योंकि उनका सबसे ताजातरीन अपराध यह है कि हरियाणा के रिवाड़ी शहर में पूर्व सैनिकों की रैली में वह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के साथ एक ही मंच पर विराजमान थे।

निहित स्वार्थ कितने नीचे गिर सकते हैं, इसका स्पष्ट प्रमाण एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में छपी 2 ‘प्लांटेड’ रिपोर्टों से मिलता है जिनमें जनरल वी.के. सिंह को फंसाने के लिए आरोप लगाया गया कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर की सरकार को पलटाने और अपने उत्तराधिकारी (वर्तमान सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह) की पदोन्नति रोकने के लिए टैक्नीकल सॢवस डिवीजन (टी.एस.डी.) के गोपनीय कोष का दुरुपयोग किया। किसी ने भी इस बात पर गम्भीरता से गौर नहीं किया कि इस ‘सनसनीखेज खुलासे’ का आधार बेशक सैन्य सूत्रों को बताया गया है लेकिन फिर भी इसमें कुछ आधारभूत त्रुटियां हैं।

कुछ भी हो, सरकार चाहे कैसा भी प्रभाव पैदा करने की कोशिश करे, यह एक तथ्य है कि टी.एस.डी. जैसा कोई भी विशेष यूनिट रक्षा मंत्रालय द्वारा अधिकारित स्वीकृति के बिना स्थापित नहीं किया जा सकता। यह भी सोचने का विषय है कि क्या कोई समझदार व्यक्ति यह विश्वास कर सकता है कि उमर अब्दुल्ला सरकार क्या इतनी ही कमजोर है जिसे इसका कृषि मंत्री गुलाम हसन मीर गिरा देगा? इसी गुलाम हसन मीर पर राज्य सरकार को ‘अस्थिर करने’ के लिए कथित तौर पर टी.एस.डी. कोष में से 1.9 करोड़ रुपए रिश्वत लेने का आरोप है।

विडम्बना ही है कि श्री मीर इन सनसनीखेज खुलासों के बावजूद अभीतक उमर अब्दुल्ला सरकार में अपने पद पर जमे हुए हैं! यह तथ्य अपने आप में ही इस बात का प्रमाण है कि सत्यवादी कौन है, हालांकि कुछ राजनीतिक हलकों ने जनरल वी.के. सिंह पर ही यह रिपोर्ट लीक करने का आरोप लगाया था। बाद में पी.एम.ओ. ने इस पूरे प्रकरण में हुई किसी प्रकार की भूल चूक से जनरल सिंह को पाक-साफ करार दे दिया। फिर भी सवाल यह उठता है कि इस अति गोपनीय पत्र को लीक करके देशद्रोह की कार्रवाई करने वाले अधिकारी को क्या कोई सजा दी गई है?

इससे पहले अप्रैल 2012 में समाचार पत्र ने ही अपने पाठकों को जनवरी 2012 में शुरू किए गए राज पलटे के कथित प्रयास के बारे में भी ऐसी ही ‘एक्सक्लूसिव स्टोरी’ परोसी थी। इसमें जनरल वी.के. सिंह को तब राज पलटे की साजिश में फंसाने की कोशिश की गई थी जब वह अभी रिटायर नहीं हुए थे। हमें यह बताया गया था कि मामले की और जांच की जाएगी। अब इस बात को भी 20 महीने हो गए हैं। रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री प्रसन्नता से मौन साधे हुए हैं। ‘प्लांटेड लीक’ में सहभागी होने के लिए समाचार पत्र के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई।

हम जानते हैं कि कभी लोक हितों के लिए संघर्षरत रहे इस समाचार पत्र में यह मनघड़ंत कहानी क्यों और कैसे प्रकाशित हुई? कितने दुख की बात है कि रामनाथ गोयंका जैसे विख्यात व्यक्तित्व से जुड़ा यह समाचार पत्र भारत सरकार के ‘डर्टी ट्रिक्स विभाग’ का हिस्सा बन गया है। यह एक दोहरी त्रासदी है-गुंजायमान मीडिया के लिए भी और गुंजायमान लोकतंत्र के लिए भी। व्यवस्था में मौजूद भ्रष्ट व्यवहारों को नंगा करना एक बात है लेकिन ईमानदार व्यक्तियों की आवाज बंद करने के लिए मीडिया का दुरुपयोग करना बिल्कुल अलग बात है।

पूर्व सैनिकों की रिवाड़ी रैली के मातृ दो दिन बाद जो (सनसनीखेज खुलासों) का प्रकट होना इनके पीछे कार्यरत अध-कचरी सच्चाईयों के बखिए उधेडऩे के लिए क्या एक सशक्त प्रमाण नहीं? जहां तक जनरल वीके सिंह के लिए आयु विवाद का सवाल है, हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उनकी ये टिप्पणी सम्मरण करनी होगी कि "यदि शीघ्र शस्त्र अदालत दसवीं कक्षा के प्रमाण पत्र पर विश्वास करते हुए एक बलात्कारी को अवयस्क मान सकती है तो मेरे सर्टिफिकेट के मामले में बार बार सत्यापन और प्रयोगशाला में कार्बन डेटिंग की जरूरत क्यों महसूस होती है।"

हम माननीय सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण सम्मान करते हैं, खासतौर पर हाल में भ्रष्टाचार और अन्य मामलों के संबंध में इसके दीलेराना फैसलों के कारण तो और भी अधिक सम्मान करते हैं लेकिन फिर भी हम कहना चाहेंगे कि जिस जनरल को देश की सीमाओं और राष्ट्रीय स्वायत्ता की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। उसी बात पर विश्वास करते समय संकोच क्यों दिखाया जाता है?

न्यायपालिका को जनरल की टिप्पणियों के प्रति जरूरत से अदिक संवेदनशील होने की जरूरत नहीं। आकिर लोकतंत्र में हमें ऐसी अवाज का भी सम्मान करना होता है जो सरकार के सुर में सुर नहीं मिलाती। न्यायपालिका ने हमारे संविधान एवं नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करनी होती है। क्या सेना के जनरल भी हमारे सम्माननीय नागरिक नहीं हैं?


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