मन्ना डे : एक अमर आवाज़ जो कायनात में ही घुल-मिल गई

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Thursday, October 24, 2013-2:47 PM

मुंबई: नथनी से मोती का टूटना उतनी ही बड़ी बात है जितना जिस्म से रूह का जुदा होना ..मन्ना डे संगीत के अनमोल मोती थे ... यह मोती जिस्म से रूह की तरह टूट गया हो, लेकिन यह आवाज़ कायनात में ही घुल-मिल गयी है।

प्रबोध चन्द्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म एक मई 1920 को कोलकाता में हुआ था। मन्ना डे के पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे लेकिन उनका रुझान संगीत की ओर था और वह इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते थे। मन्ना डे ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा के.सी.डे से हासिल की।

मन्ना डे के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाक्या है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा यह कौन गा रहा है। मन्ना डे को जब बुलाया गया तो उन्होंने अपने उस्ताद से कहा, ‘‘बस, ऐसे ही गा लेता हूं’’, लेकिन बादल खान ने मन्ना डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे।

मन्ना डे 40 के दशक में चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। वर्ष 1943 में फिल्म ‘तमन्ना’ में बतौर पाश्र्वगायक उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस में गा चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि यही एकमात्र फिल्म थी। जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था।

शुरुआती दौर में श्री डे की प्रतिभा को पहचानने वालों में संगीतकार, शंकर जयकिशन का नाम सबसे ऊपर है। इस जोड़ी ने मन्ना डे से अलग-अलग शैली में गीत गवाए। उन्होंने मन्ना डे से ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम’ जैसे रमानी गीत और ‘केतकी गुलाब जूही’ जैसे  शास्त्रीय राग पर आधारित गीतों को आवाज दिलाई। दिलचस्प बात यह है कि  शुरुआत में मन्ना डे ने ‘केतकी गुलाब जूही’ गीत गाने से मना कर दिया था।

संगीतकार शंकर जयकिशन ने जब मन्ना डे को ‘केतकी गुलाब जूही’ गीत गाने की पेशकश की तो पहले वह इस बात से घबरा गए कि भला वह महान शास्त्रीय संगीतकार भीमसेन जोशी के साथ कैसे गा पाएंगे। मन्ना डे ने सोचा कि कुछ दिनों के लिए मुंबई से दूर पुणे चला जाए। बात जब पुरानी हो जाएगी तो वह वापस मुंबई लौट आएंगे और उन्हें भीमसेन जोशी के साथ गीत नहीं गाना पड़ेगा लेकिन बाद में उन्होंने इसे चुनौती के रप में लिया और ‘केतकी गुलाब जूही’ गीत को अमर बना दिया।

वर्ष 1950 में संगीतकार एस. डी. बर्मन की फिल्म मशाल में मन्ना डे को ‘ऊपर गगन विशाल’ गीत गाने का मौका मिला। फिल्म और
गीत की सफलता के बाद बतौर पाश्र्वगायक वह अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।

मन्ना डे को अपने करियर के शुरुआती दौर में अधिक शोहरत नहीं मिली। इसकी मुख्य वजह यह रही कि उनकी सधी हुई आवाज किसी
गायक पर फिट नहीं बैठती थी। इसी कारण से एक जमाने में वह हास्य अभिनेता  महमूद और चरित्र अभिनेता प्राण के लिए गीत गाने को
मजबूर हुए थे।

वर्ष 1961 मे संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के निर्देशन में फिल्म ‘काबुली वाला’ की सफलता के बाद मन्ना डे शोहरत की बुंलदियो पर जा पहुंची। फिल्म काबुली वाला में उनकी आवाज में प्रेम धवन रचित यह गीत ‘ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन’ आज भी श्रोताओं की आंखो को नम कर देता है।

प्राण के लिए उन्होंने फिल्म उपकार में ‘कस्मे वादे प्यार वफा’ और जंजीर में ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी’ जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म पड़ोसन में हास्य अभिनेता महमूद के लिए ‘एक चतुर नार’ गीत गाया तो उन्हें महमूद की आवाज समझा जाने लगा।

आमतौर पर पहले माना जाता था कि मन्ना डे केवल शास्त्रीय गीत ही गा सकते हैं लेकिन बाद में उन्होंने ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ ‘ओ मेरी जोहरा जबीं’, ‘ए रात भीगी-भीगी’ ‘ना तो कारवां की तलाश है’ और ‘ए भाई जरा देख के चलो’ जैसे गीत गाकर अपने आलोचकों का मुंह सदा के लिए बंद कर दिया।

प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन ने मन्ना डे के बारे में कहा था, ‘‘मन्ना डे हर रेंज में गीत गाने में सक्षम है। जब वह ऊंचा सुर लगाते है तो ऐसा
लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है।’’ जब वह नीचा सुर लगाते हैं तो लगता है उसमें पाताल जितनी गहराई है और यदि वह
मध्यम सुर लगाते है तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है।

मन्ना डे के पाश्र्वगायन के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि मन्ना डे हर वह गीत गा सकते हैं। जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाए हों लेकिन इनमें कोई भी मन्ना डे के हर गीत को नहीं गा सकता है। इसी तरह आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने एक बार कहा था। आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं लेकिन यदि मुझसे पूछा जाए तो ‘मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूं।’

मन्ना डे केवल शब्दों को ही नहीं गाते थे। अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति ‘मधुशाला’ को स्वर देने के लिए मन्ना डे का चयन किया।

मन्ना डे को फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1971 में पद्मश्री पुरस्कार और  वर्ष 2005 में पदमभूषण पुरस्कार से सम्मानित
किया गया। इसके अलावा वह वर्ष 1969 में फिल्म मेरे हुजूर के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक, 1971 में बंगला फिल्म ‘निशि पदमा’ के लिए
सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किए गए।

मन्ना डे के संगीत के सुरीले सफर में  एक नया अध्याय जुड़ गया जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 2007 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मन्ना डे ने अपने पांच दशक के करियर में लगभग 3500  गीत गाए।

करोड़ों संगीत प्रेमियों के हृदय सम्राट मन्ना डे ने आज तड़के बेंगलूर के नारायण हृदयालय में अंतिम सांस ली। उन्हें सांस लेने में तकलीफ के साथ ही गुर्दे की बीमारी भी थी।


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