आसान नहीं था हर्षवर्धन के नाम का ऐलान

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Thursday, October 24, 2013-11:55 AM

नई दिल्ली (धनंजय कुमार) : पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री का दावेदार पेश करके भाजपा ने पार्टी में बीते लंबे समय से चल रही अनिश्चितता की स्थिति को खत्म कर दिया है। हालांकि पार्टी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था, लेकिन 4 प्रमुख दावेदारों में से पार्टी ने डॉ. हर्षवर्धन पर विश्वास जताकर यह साफ  कर दिया है कि उसके पास इससे बेहतर विकल्प नहीं था। करीब आठ महीने पहले प्रदेश अध्यक्ष पद पर विजय गोयल को बैठाना डॉ. हर्षवर्धन के लिए फायदेमंद साबित हुआ। यह भी महत्वपूर्ण है कि डॉ. हर्षवर्धन के लिए पार्टी के सभी नेताओं को साथ लेकर चलना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को टक्कर देना आसान नहीं होगा। लेकिन जिस तरह से पार्टी मुख्यालय मे काफी संख्या में सिख पहुंच हुए थे उससे एक बात तो साफ हो गई है कि दिल्ली की राजनीति में प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा के नजदीकी हर्षवर्धन को पंजाबी वोटरों का भी साथ मिलेगा। 

प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए 4 प्रमुख दावेदार थे। इनमें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विजय गोयल, दिल्ली विधानसभा में प्रो विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन तथा चौथा नाम प्रो. जगदीश मुखी का सामने आ रहा था। निगम चुनाव के बाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता का कार्यकाल पूरा होने के बाद विजय गोयल को इस पद पर बैठाया गया। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री पद के  उम्मीदवार ढूंढऩे की थी।

पार्टी के बड़े नेताओं के बीच जब ये चारों नाम आए तो वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विजय गोयल को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बैठाने के बाद पंजाबी वोटरों पर डोरे डालने के लिए किसी पंजाबी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहते थे। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में प्रो विजय कुमार मल्होत्रा पर दांव आजमा हार का स्वाद चख चुकी भाजपा इनके नाम पर दोबारा विचार कर जोखिम नहीं लेना चाह रही थी। वहीं प्रो. जगदीश मुखी के नाम पर बिलकुल भी सहमति नहीं बनी और विजय गोयल पर विपक्षी पार्टियां हमलावर होने के साथ भाजपा के अंदर भी गुटबाजी बढ़ रही थी।

ऐसे में डॉ. हर्षवर्धन इकलौते ऐसे नेता थे जिनके नाम पर न तो पार्टी के अंदर ज्यादा विवाद है और न ही विपक्षी पार्टियों के पास कोई ठोस मुद्दा। दूसरी ओर डॉ. हर्षवर्धन प्रो मल्होत्रा के काफी माने जाते हैं जिससे पार्टी को पंजाबी वोट खिसकने का डर भी नहीं था। क्योंकि प्रदेश भाजपा का लंबा इतिहास रहा है कि पंजाबी या फिर वैश्य समुदाय के नेता ही उसकी अगुवाई करते रहे हैं। अब चूंकि मदनलाल खुराना अकसर अस्वस्थ रह रहे हैं ऐसे में पार्टी ने हर्षवर्धन को दावेदार बनाकर पंजाबी वोटरों को भी अपने से छिटकने से बचाया है। इसलिए पार्टी ने एक तरह से पंजाबी और वैश्य वोटरों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। 

Edited by:Jeta
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