कई रैलियों का गवाह बना है पटना का गांधी मैदान

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Friday, October 25, 2013-2:24 PM

पटना: बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 27 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की होने वाली ‘हुंकार रैली’ को पार्टी अभूतपूर्व रैली करार दे रही है, लेकिन गांधी मैदान इससे पहले भी कई महत्वपूर्ण रैलियों का गवाह बन चुका है, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया है। कहा जाता है कि बिहार रैलियों का प्रदेश रहा है जहां की राजनीति में रैली का अपना महत्व रहा है।

बिहार की राजनीति के जानकार भी कहते हैं कि अब कुर्सी की दावेदारी और अपना शक्ति प्रदर्शन करने के लिए राजनीतिक दल रैलियों का सहारा लेते हैं, लेकिन पूर्व में रैलियों का आयोजन जनता और देश के हित के लिए किया जाता था। वैसे पूर्व में रैलियों की जगह पर सभाएं होती थी और धीरे-धीरे इन सभाओं ने रैलियों की शक्ल अख्तियार कर ली।

बिहार की रैलियों के इतिहास पर गौर करें तो वर्ष 1967 में राम मनोहर लोहिया की विशाल सभा का आयोजन गांधी मैदान में हुआ था जहां हजारों लोग पहुंचे थे। गांधी मैदान में 70 के दशक में जय प्रकाश नारायण (जेपी) की सभाएं होती रही हैं। पांच जून 1975 को जेपी आंदोलन की रैली अब तक की सबसे विशाल रैली मानी जाती है। इसी रैली के दौरान जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था।

इस रैली में बिहार के गांव-गांव से लोग आए थे और सबकी मंजिल गंाधी मैदान थी। गांधी मैदान उस दिन न सिर्फ खचाखच भरा था, बल्कि लोग जेपी को सुनने के लिए सड़कों पर भी खड़े थे।

1980 के दशक में गांधी मैदान में कुछ चुनावी सभाएं तो जरूर हुई परंतु रैलियों को लेकर यहां सूनापन रहा। इसके बाद 1990 के दशक में सभाओं ने रैलियों की शक्ल अख्तियार कर ली और राजनीतिक दल रैलियों के नाम पर शक्ति प्रदर्शन करने लगे। यह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद का दौर था। लालू के सत्ता में आने के बाद रैलियों चर्चित होने लगीं।

राजनीतिक दल रैलियों में जुटने वाली भीड़ से अपनी ताकत का अहसास कराने लगे और अपना कद बढ़ाने के लिए इन रैलियों का उपयोग करने में जुट गए। इन रैलियों के नायक लालू प्रसाद के अलावा राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, जॉर्ज फर्नांडीस जैसे चर्चित नेता रहे हैं।

लालू द्वारा की गई रैलियों में वर्ष 1995 में ‘गरीब रैली’, 1996 में ‘गरीब रैला’, वर्ष 1997 में ‘महागरीब रैला’, 2003 में ‘लाठी रैली’, 2007 में ‘चेतावनी रैली’ और 2012 में ‘परिवर्तन रैली’ प्रमुख रैलियों में शुमार रही। कहा जाता है कि लालू के शासन काल में जितनी रैलियां हुईं, उन रैलियों से न केवल उनका राजनीति कद बढ़ा बल्कि उनकी पहचान राष्ट्रीय राजनीति में होने लगी।

नीतीश कुमार ने भी वर्ष 2012 में ‘अधिकार रैली’ आयोजित कर अपना नाम रैलियों के इतिहास में दर्ज कराया। इस रैली के माध्यम से नीतीश ने जहां बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर केन्द्र सरकार को बिहार की भावनाओं से अवगत कराया, वहीं पिछड़े राज्यों को गोलबंद करने का आह्वान भी किया।

इधर, 27 अक्टूबर को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ‘हुंकार रैली’ की सफलता को लेकर पार्टी नेता जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद का कहना है कि यह रैली बिहार में राजनीतिक बदलाव लाएगी।


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